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हरितालिका व्रत कथा

“हरितालिका व्रत क महत्व कें बताबै वाला शिव आ पार्वती क बीच भेल दिव्य संवाद।”

हरितालिका तीज व्रत कथा (शिव-पार्वती संवाद)

१. व्रतक महत्व आ पूर्वजन्मक स्मरण

कैलाश पर्वतक रमणीय शिखर पर भगवती पार्वती भगवान शिवजी सँ हाथ जोडि कऽ पुछलनि— "हे महेश्वर! हम कोन पुण्य आ तपस्या कएने छलहुँ जाहि सँ अहाँ सन देवाधिदेव महादेव हमरा पतिक रूप मे प्राप्त भेलाह?"

भगवान शंकर प्रसन्न भऽ कहलखिन— "हे देवी! अहाँ पूर्वजन्म मे राजा दक्षक पुत्री सती छलीह आ एहि जन्म मे पर्वतराज हिमालय आ रानी मैनाक पुत्री पार्वती रूप मे जन्म लेलहुँ। बाल्यकालहि सँ अहाँ हमरा वर रूप मे पयबाक लेल कठोर संकल्प केने रही।"

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२. देवर्षि नारदक आगमन आ पार्वतीक संताप

एक दिन देवर्षि नारद हिमालय राजक दरबार मे पधरलाह आ कहलनि जे भगवान विष्णु स्वयं राजकुमारी पार्वती सँ विवाह करबाक इच्छा रखैत छथि। हिमालय राज ई प्रस्ताव सुनि अत्यंत हर्षित भेलाह आ स्वीकृति दऽ देलनि। मुदा जखन पार्वतीजी केँ ई समाचार भेटलनि तँ ओ अत्यंत दुःखी भऽ गेलीह, कारण ओ मन-वचन-कर्म सँ भगवान शिव केँ अपन पति मानि चुकल छलीह।

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३. सखी द्वारा हरण (हरितालिका नामकरण)

पार्वतीजी अपन व्यथा अपन प्रिय सखी केँ सुनेलनि। सखी हुनका सांत्वना दैत कहलनि जे ओ हुनका एहन घनघोर वन मे लऽ जेतीह जतय महाराज हिमालय हुनका नहि ताकब सकथि। सखी द्वारा पार्वतीजीक हरण कएल गेल— 'हरित' (हरण) आ 'आलिका' (सखी), एहि कारणेँ एहि पावन व्रतक नाम 'हरितालिका' पडल।

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४. बालुक शिवलिंग आ कठोर तपस्या

वन मे एकटा शांत नदीक तट पर गुफाक भीतर पार्वतीजी अपन सखीक संग रहय लगलीह। ओतय ओ पार्थिव (बालु आ माटिक) शिवलिंग निर्माण कऽ कठोर तपस्या प्रारंभ कएलनि। ओ सूखल पात चबा कऽ आ बाद मे निर्जला रहि कऽ दिन-राति शिव आराधना मे लीन रहलीह। भाद्रपद मासक शुक्ल पक्षक तृतीया तिथि (हस्त नक्षत्र) केँ पार्वतीजी राति भरि जागरण करैत चारू पहर शिवजीक पूजन आ भजन कएलनि।

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५. भगवान शिवक वरदान आ विवाह

पार्वतीजीक एहि अखंड आ अटल तपस्या सँ देवाधिदेव महादेवक आसन डोलि उठल। ओ तुरंत प्रकट भऽ वरदान मंगबाक लेल कहलनि। पार्वतीजी कहलनि— "हे नाथ! जँ अहाँ हमरा पर प्रसन्न छी तँ हमरा अपन अर्धांगिनी रूप मे स्वीकार करू।" भगवान शिव 'तथास्तु' कहि अंतर्ध्यान भऽ गेलाह। भोर भेला पर पार्वतीजी नदी मे पार्थिव शिवलिंग विसर्जित कऽ अपन सखीक संग व्रत पारण कएलनि। तत्पश्चात महाराज हिमालय ओतय पहुँचलाह आ पार्वतीजीक इच्छा जानि पूर्ण वैदिक विधिक संग शिव-पार्वतीक शुभ विवाह संपन्न करौलनि।

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६. पूजा विधि आ फलश्रुति

मिथिला मे नवविवाहिता आ सौभाग्यवती स्त्रीगण अखंड सौभाग्य, पतिक दीर्घायु आ सुख-समृद्धिक कामना सँ भाद्रपद शुक्ल तृतीया केँ निर्जला रहि पार्थिव शिव-पार्वती आ गणेशजीक पूजन करैत छथि। फुलेरा बान्हि कऽ राति भरि भजन आ कथा श्रवण करबाक विधान अछि।

🕉️ पवित्र पाठ समाप्त
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