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हरितालिका व्रत कथा
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हरितालिका व्रत कथा (शिव-गौरी संवाद):तपस्या आ विवाह प्रस्ताव:प्राचीन काल मे हिमालय राजक पुत्री पार्वती भगवान शिव केँ अपन पति रूप मे प्राप्त करबाक लेल कठोर तपस्या कएलनि। ओ अन्न-जल त्यागि कऽ केवल हवा आ सुखल पत्ता पर जीवन बितौलनि। एहि बीच नारद मुनि भगवान विष्णु लेल पार्वतीक विवाहक प्रस्ताव लऽ कऽ हिमालय लग एलाह। हिमालय प्रसन्न भऽ स्वीकार कऽ लेलनि, मुदा पार्वती ई सुनि अत्यंत दुखी भेलीह।हरितालिका (हरण + आलिका):पार्वतीक सखी हुन्का पिताक घर सँ 'हरण' कऽ (चोरा कऽ) एकटा घना जंगल मे लऽ गेलीह, जाहि सँ ई व्रत 'हरितालिका' कहाएल। जंगल मे एकटा गुफाक भीतर, भादो मासक शुक्ल पक्षक तृतीया तिथि कऽ, पार्वती बालू (बालुका) सँ शिवलिंग बना कऽ रात्रि जागरण आ कीर्तन कएलनि।शिवजी क वरदान:पार्वतीक कठोर निष्ठा आ प्रेम देखि भगवान शिव प्रसन्न भऽ प्रकट भेलाह आ हुन्का अपन अर्धांगिनी बनयबाक वरदान देलखिन। ई व्रत सुहागिन स्त्री सभ अखंड सौभाग्य आ कुंवारी कन्या सभ मनचाहा वर प्राप्त करबाक लेल करैत छथि।
अर्थ
हरितालिका व्रत के महत्व को प्रकट करने वाला शिव और पार्वती के बीच का दिव्य संवाद।