हरिवासल व्रत कथा
“श्रीमद्भागवत क नवम स्कंध (चतुर्थ अध्याय) सँ उद्धृत भक्तराज अम्बरीष आ महर्षि दुर्वासा क पावन कथा, तथा मिथिला मे ४८ घण्टाक कठोर हरिवासल व्रतक महत्व आ चारि दिनक अनुष्ठान।”
हरिवासल व्रत कथा (राजा अम्बरीष आ महर्षि दुर्वासा प्रसंग)
ई कथा श्रीमद्भागवत क नवम स्कंध क चतुर्थ अध्याय सँ लेल गेल अछि, जे ई सिद्ध करैत अछि जे भगवान क दरबार मे एकटा राजा आ एकटा परम तपस्वी ऋषि मे सँ, अहंकार रहित भक्त क स्थान कतेक ऊपर अछि।
भक्तराज अम्बरीष क निष्काम भक्ति आ महासंकल्प
सत्ययुग मे सूर्यवंश क राजा नाभाग क पुत्र राजा अम्बरीष समस्त पृथ्वी क चक्रवर्ती सम्राट छलाह। हुनकर पास अपार वैभव, सेना आ सात द्वीप क साम्राज्य छल। मुदा, राजा अम्बरीष क विशेषता ई छलि जे ओ अपन हाथ सँ भगवान क मंदिर क सेवा करैत छलाह, कान सँ हरि-कथा सुनैत छलाह, आंखि सँ ठाकुर जी क रूप देखैत छलाह आ पैर सँ तीर्थ यात्रा करैत छलाह। ओ अपन राजपाठ कए भगवान क धरोहर मानि कए निष्काम भाव सँ प्रजा क पालन करैत छलाह। अपन आत्म-शुद्धि लेल ओ अपन महारानी क संग एक वर्ष धरि लगातार प्रत्येक एकादशी आ हरिवासर क कड़ा व्रत रखबाक महासंकल्प लेने छलाह।
द्वादशी पारणा आ महर्षि दुर्वासा क आगमन
वर्ष क अंतिम एकादशी व्रत छल। राजा अम्बरीष लगातार तीन दिन सँ उपवास पर छलाह (कठोर संयम क संग)। चारिम दिन, यानी द्वादशी तिथि क भोर मे राजा पारणा क तैयारी क रहल छलाह। ओ ब्राह्मण सब कए उत्तम भोजन करौने छलाह, गो-दान कएने छलाह आ जेना ही ओ स्वयं अन्न ग्रहण करय जा रहल छलाह, तखने ओतय महर्षि दुर्वासा अपन १०,००० शिष्य क संग पधारलाह।
ऋषि दुर्वासा साक्षात भगवान शिव क क्रोधांश सँ उत्पन्न भेल छलाह आ हुनकर क्रोध सँ तीनू लोक थर-थर कांपैत छल। राजा अम्बरीष हुनका साक्षात भगवान क रूप मानि कए गोड़ लगलनि आ भोजन ग्रहण करबाक आग्रह कएलनि। दुर्वासा ऋषि कहलनि, "राजन्! हम सब एखने कालिंदी (यमुना) नदी मे स्नान आ मध्याह्न संध्या क कए आबैत छी, तब धरि अहाँ भोजन नहि करब।"
दुर्वासा ऋषि आ हुनकर शिष्य गण यमुना तट पर गेलाह। मुदा ओतय ओ सब ध्यान-साधना मे एहन लीन भेलाह जे हुनका समय क भान नहि रहलनि। इधर, राजमहल मे ज्योतिषी ओ पुरोहित सब घड़ी-पल नापि कए राजा कए चेतौलनि जे द्वादशी तिथि समाप्त होय मे मात्र किछ मिनट बचल अछि।
राजा क आगाँ दुईटा विनाशकारी परिस्थिति छलि:
विकट परिस्थिति मे राजा अम्बरीष अपन कुल पुरोहित वशिष्ठ आ विद्वान ब्राह्मण सब सँ सम्मति लेलनि। वशिष्ठ जी कहलनि— "राजन्! श्रुति आ शास्त्र क वचन अछि जे जल पीबब भोजन कएला क बराबरो अछि (क्योकि ओकर पाचन होइत अछि आ शरीर कए शक्ति भेटैत अछि) आ नहि कएला क बराबरो अछि (क्योकि ओ अन्न नहि अछि, ओकरा उपवास तोड़ब नहि कहल जाइत)।"
एहि धार्मिक युक्ति क आधार पर, राजा अम्बरीष भगवान विष्णु क चरणामृत (तुलसी क पत्ता आ जल क एक बूंद) जीभ पर राखि कए अपन व्रत क तकनीकी पारणा क लेलनि आ अन्न क थारी क आगाँ हाथ जोड़ि कए ऋषि क प्रतीक्षा करय लगलाह।
दुर्वासा क क्रोध आ सुदर्शन चक्र सँ रक्षा
जखन महर्षि दुर्वासा स्नान क कए लौथलाह, त अपन योग बल सँ हुनका थाह लागि गेल जे अम्बरीष जल पी लेने छथि। दुर्वासा ऋषि क्रोध सँ लाल भ गेलाह। ओ चिल्ला कए कहलनि, "अम्बरीष! अहाँ धन क मद मे अंधा भ गेल छी। अहाँ हमरा जेहन तपस्वी कए निमंत्रण द कए हमरासँ पहिने जल पी लएलहु? हम अहाँ कए एखने एकर फल दैत छी।"
दुर्वासा ऋषि अपन एकटा जटा उपड़लनि आ पृथ्वी पर पटकलनि। ओहि जटा सँ प्रलय क आगि उगलैत एकटा भयानक राक्षसी उत्पन्न भेल, जेकर नाम ‘कृत्या’ छल। हाथ मे नग्न तलवार लेल कृत्या राजा अम्बरीष कए मारबाक लेल दौड़ल। मुदा, भक्त अम्बरीष अपन जगह सँ एक इंचो नहि हिलाह, ओ हाथ जोड़ि कए आंखि मुद्रित क कए केवल भगवान हरि क ध्यान करय लगलाह।
अपन शरणागत भक्त पर आँच आबैत देखि कए, वैकुंठ मे विराजमान भगवान विष्णु क परम अस्त्र सुदर्शन चक्र स्वतः ओतय प्रकट भ गेल। सुदर्शन चक्र क चमक सूर्य सँ करोड़ो गुणा बेसी छलि। ओ एक पल मे राक्षसी कृत्या कए जरा कए राख क देलक। ओकर बाद, सुदर्शन चक्र ओहि क्रोधी ऋषि दुर्वासा क तरफ बढ़ल, जे एहि अन्याय क जड़ि छलाह।
सुदर्शन क भयानक ताप देखि कए दुर्वासा ऋषि अपन ज्यान बचेबाक लेल भागे लगलाह। ओ आकाश, पाताल, दसों दिशा मे दौड़लाह, मुदा सुदर्शन चक्र हुनकर पाछू लागल रहल।
ओ ब्रह्मलोक गेलाह, ब्रह्मा जी कहलनि, "हम सृष्टि क रचयिता जरूर छी, मुदा जे चक्र भगवान विष्णु क अछि, ओकरा रोकबाक सामर्थ्य हमरा मे नहि अछि।"
ओ कैलाश गेलाह, भगवान शिव कहलनि, "दुर्वासा! अहाँ विष्णु क भक्त क अपराध कएने छी। हमर शक्ति हरि क चक्र क आगाँ नहि चलत। अहाँ तुरंत ओहि विष्णु क शरण मे जाऊ।"
वैकुंठ मे भगवान विष्णुक अमर वचन आ अम्बरीष क क्षमाशीलता
अंत मे, चारू तरफ सँ जरैत आ हताश भ कए दुर्वासा ऋषि वैकुंठ लोक पहुचलाह आ साक्षात भगवान नारायण क चरण मे गिर कए त्राहि-त्राहि करय लगलाह। तखन भगवान विष्णु जे वचन कहलनि, ओ सनातन धर्म क रीढ़ अछि:
"अहं भक्त-पराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। भक्तैर्निहृतहृदयो भक्तभक्तजनप्रियः॥"
अर्थात्: "हे ब्राह्मण! हम स्वतंत्र नहि छी, हम पूरी तरह सँ अपन भक्त क अधीन छी। साधु आ भक्त सब हमर हृदय कए अपन प्रेम सँ जीति लेने छथि। जे लोक अपन स्त्री, पुत्र, घर, प्राण आ धन सब हमरा अर्पित क देने छथि, हम ओकरा कखनो नहि छोड़ि सकैत छी। अहाँ हमर भक्त अम्बरीष क अहित कएने छी, एहि द्वारे हमरो पास अहाँ कए बचेबाक कोनो उपाय नहि अछि। अहाँ तुरंत पृथ्वी पर जाऊ, जँ अम्बरीष अहाँ कए क्षमा क देताह, त सुदर्शन चक्र अपन आप शांत भ जाएत।"
महर्षि दुर्वासा पूरा एक वर्ष धरि सुदर्शन चक्रक डर सँ तीनों लोकमे भागैत रहलाह। आ एतय राजा अम्बरीषक महानता देखू—ओहि पूरा एक वर्ष धरि राजा अम्बरीष एहि चिन्तामे अन्न-जलक एकटा दाना सेहो ग्रहण नहि कएलनि जे हमर आमन्त्रित अतिथि संकटमे छथि! ओ लगातार भूखल-पियासल रहि कऽ भगवान सँ ऋषिक प्राण-रक्षाक प्रार्थना करैत रहलाह।
अंत मे दुर्वासा ऋषि वापस राजा अम्बरीष क दरबार मे आबि कए हुनकर पैर पकड़ि लेलनि। राजा अम्बरीष कए अत्यंत ग्लानि भेल जे एकटा वयोवृद्ध तपस्वी ब्राह्मण हुनकर गोड़ लागल छथि। राजा तुरंत हाथ जोड़ि कए सुदर्शन चक्र सँ प्रार्थना कएलनि— "हे प्रभु क अस्त्र! जँ हम जीवन मे कखनो निष्काम भाव सँ भक्ति कएने होई, जँ हमर मन मे समस्त जीव क प्रति दया होए, त अहाँ शांत भ जाऊ आ एहि ब्राह्मण क रक्षा करू।"
राजा क प्रार्थना सुनतै सुदर्शन चक्र तुरंत वैकुंठ वापस चलि गेल। दुर्वासा ऋषि क ज्यान बचलनि, हुनकर अहंकार चूर भ गेल आ ओ राजा अम्बरीष कए आशीर्वाद देलनि।
हरिवासल क महत्व आ चारि दिनक अनुष्ठान
जखन भगवान विष्णु देखलनि जे राजा अम्बरीष अपन अतिथिका प्राण रक्षाक लेल एक वर्ष धरि भूखल रहलाह आ विशेष रूप सँ एकादशी-द्वादशीक ओहि महासंकट कालमे भगवानक ध्यानमे लीन छलाह, तँ भगवान भावुक भऽ गेलाह।
पौराणिक मान्यता अछि जे अपन भक्तक भूख आ कष्ट देखि स्वयं भगवान श्रीहरि (विष्णु) ओहि तिथिक ४८ घण्टा धरि वैकुण्ठमे निराहार (भूखल) रहि कऽ वास कएलनि। जहि तिथि कए स्वयं 'हरि' (भगवान) भूखल रहलाह (वास कएलनि), तहि सँ एकरा "हरिवासल व्रत" कहल गेल।
एहि कथा मे भगवान विष्णु कहने छथि कि जे भक्त एकादशी क संग-संग द्वादशी (हरिवासर काल) कए सेहो पूर्ण श्रद्धा सँ निराहार आ निर्जला रहि कए व्यतीत करैत छथि, हुनका पर प्रभु क असीम कृपा बनल रहैत अछि।
मिथिला मे ई व्रत क अनुष्ठान कोनो तपस्या सँ कम नहि अछि। एहि मे चारि दिन धरि शरीर आ मन कए कड़ा अनुशासन मे राखल जाइत अछि:
