पाछाँ (व्रत कथा)

मधुश्रावणी व्रत कथा

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पूजाक सामिग्री आ ओरिआओन

नव विवाहइत याने वर्षाभ्यन्तरमे जाहि कन्याक विवाह भेल होइक ओ साओन वदि चौठ कऽ संध्या काल जाही, जूही, अगर, तगर, नीम दाड़िम तथा मेहदीक पात लोढ़ि कऽ राखथि। ता कन्याक अभिभाविका किंवा माय जाहि घरमे मधुश्रावणीक पूजा हेतैक, ओहि घरमे नीपि क' राखथि। तहन जाहिठाम पूजा हेतैक ओहिठाम पिठार सँ चौखूट क' अरिपन देथि। अरिपनमे पश्चिमसँ वर-कन्याक प्रवेश हेतु थोरेक बाट राखि देथि।

अरिपन :- चौकोर जे अरिपनक घेरा ताहि मध्य दुनू उत्तर आ दक्षिण कोन पर पुरहरा पातिल रखबाक जगह पर दू टा गोल अरिपन रहै छै, जाहि पर बालु पसारि देल जाइत छैक। उत्तर दिशक बालु पर पुरहर आ दक्षिण दिशक बालु पर पातिल राखल जाइत अछि। पातिलमे तेल-बाती देल दीप रहैत अछि। पुरहर पातिलक पश्चिममे अरिपन द' केँ कलशश स्थान बनावथि। एक गोट

नव धौरल डाबा पर माटि आ गोवरसँ पाँच टा साँप बनाकैँ साटल रहैत अछि। पाँचो साँपकर मुँहमे दूबि खोसि देल जाइत अछि। कलशक दक्षिण दिश सूर्य तथा चन्द्रमाक अरिपन रहैत अछि आ तकर उत्तर दिश एक जोड़ लटकल साँपकर (नाग-भाग) अरिपन रहैत अछि। एकर पश्चिममे नौ फूलवाला नवग्रहक अरिपन रहैत अछि, कलशक पश्चिममे दू गोट तीन फूलवाला अरिपन होइत अछि, उत्तरमे कुसुमावतीक हेतु आ दक्षिणमे पिडुलाक हेतु। ऐ दूनू अरिपनक नीचाँ बीचमे फेर दूटा तीन फूलवाला अरिपन देल जाइत अछि, उत्तरमे चनाइक हेतु आ दक्षिणमे लीलीकें हेतु। चनाइक अरिपनसँ उत्तर दिश मैनाक पात सन अरिपन बैरशीक एक सय एक भाइक हेतु देल जाइत अछि। दक्षिणमे एहिना लीलीक एक सय एक बहिनक हेतु एक सय एक नागिन बाला मैनाक पात सन अरिपन रहैत अछि। 'एहि दुनू अरिपनक बीच मे ठीक कलशक सामने सबसँ पश्चिम पाँच फूलवाला गौरीक हेतु अरिपन रहैत अछि। एहि फूलक बिचला तीन फूल पर गौरीक दूनू पैरक चित्र अथवा गौरीक यन्त्र लिखल रहबाक चाही। ऐ अरिपनसँ सटल दक्षिण तीन फूलवाला षष्ठिका (साठि) क अरिपन रहैत अछि।

पूजाक सामिग्री :- गौरी बनेबाक लेल हरदि, कुसुमक फूल, सिन्दुर, पान आ मेथीकें सिलौट पर पीसिक' शिवलिंगक आकारक प्रतिमा बनाके एकटा नव धौरल सरबामे ठाढ़ करथि। जाही-जूही सब पीसि पाँच टा पूड़ामे राखथि। चारिटा मैनाक पात पैघ पैघ रहक चाही जाहिमेसँ एकटा मैनाक पात पर श्रीखण्ड चानन सँ एक सय आ पिठारसँ एकटा साँपकर चित्र लिखथि। दोसर पर एक सय पीठारसँ आ एकटा चानन सँ लिखथि। ई दुनू प्रात भिनसर पूजाक काल उत्तर भागक मैनाक पातवाला अरिपन पर राखल जायत, जाहिमे अधिक चाननवाला ऊपर आ अधिक पिठारवाला तरमे राखल जाएत। तेसर मैनाक पात पर सिन्दूरसँ एक सय आ काजरसँ एकटा नागिन के चित्र लिखथि। चारिम मैनाक पात पर काजरसँ एक सय आ सिन्दूरसँ एक नागिनक चित्र बनाबथि। इहो दुनू पात भिनसरमे दक्षिण भागक मैनाक पातक आंकार वला अरिपन पर राखल जाएत, जाहिमे अधिक सिन्दूरवला ऊपर आ अधिक काजरवला तरमे राखल जाइत अछि। कुसुमावती, पिडला, चनाइ एवं लीलीक पूजा लेल चारि गोट केराक पातक पुड़ा बनाओल जाइत अछि। नैवेद्यक वस्तु यथा-अरबा चाउर, चुड़ा, चुड़लाइ, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, भीजल अंकुरी आदिक व्यवस्था कऽ लेल जाइत अछि। छाँईक हेतु एक गोट डालीमे अरबा चाउर, पाइ आ एक छाँछी दही रहैत अछि। बिनीक मोटरी हेतु-धनी, धान, दूबि, हरदि, सुपारी, बड़की अँड़ाची, छोटकी अँड़ाची, जाफर, लवंग, बड़की हरीर, छोटकी हरीर, बहेड़ा आ पाइ (ई प्रत्येक पन्द्रह-पन्द्रह गोट) एहि सबकें एक

कचुआ (आँगी) मे बान्हि पोटरी बना राखथि। पुरहर पातिल आ कलशकर तरमे देबाक लेल धान रहक चाही। गाय दूध, कुसुमक फूल, पान-सुपारी, साँख-सहेली, गौरीक लेल लाल आ पीयर फूलक माला, नीमक पात, नेबो, अमतौआ दाड़िम, पखुआ, नेङरा कुश, धामिक पात इत्यादि पूजामे रहब आवश्यक अछि। कनियाँ लेल लाल पाढ़िक पीयर साड़ी, आ तीसी फूल सन लाहक पीयर लहरठी राखथि।

पूजा आरम्भ

नाग पञ्चमी दिन पवनैतिन भिनसरे उठि नित्यकर्मसँ निवृत्त भऽ पूजाक हेतु जे सासुर सँ साड़ी, लहठी आएल हो तकरा पहिरि हाथ पैर पवित्रपूर्वक धो कऽ भगवतीक स्तुति गीत सुनैत भगवती तथा कुलदेवताकें प्रणाम कऽ पूजाक स्थान पर आबि बैसथि। तहन पातील पुरहर आ कलशवाला अरिपन पर पहिने किछु बालु धऽ जल सँ सीचि ऊपरसँ किछु धान राखि तीनूकें यथास्थान राखथि तखन कलशकेँ जलसँ भरि ऊपरसँ एक आमक पल्लव दय देथि। तकरा बाद पातिलमे दीप लेसि देथि।

अब पूजनिहार अपन आसन पर बैसथि आ गीतगाइन लोकनि गौरीक गीत गाबथि। तहन सबदीना सड़बामे बनल हाथी पर चढ़ल जे गौड़ तिनका गौड़ीक लेल जे बनल तीनटा अरिपन ताहिमे उत्तरबरिया फूल पर राखि सासुरसँ जे आएल गौरी तिनका बीचवाला फूल पर राखि मधुश्रावणीक लेल जे बनल गौरी तिनका दक्षिणवरिया फूल पर स्थान देथि।

एकटा केराक पात पर नैवेद्य आ दोसर पर फूल, अक्षत, चानन, बेलपात, धूप, दीप, आदिक व्यवस्था कऽ लेथि आ तहन गौरीक पूजा निम्न मंत्रसँ पंचोपचार करथि।

गौरी पूजा

अब कनियाँ निम्नलिखित क्रमे पूजा करैत छथि। दहिना हाथक औंठा आ अनामिका सँ सिन्दूर लऽ-

"ऐं गौरी ! महामाये, चन्दन डारि तोड़ैत एलहुँ सोहाग भाग बटैत एलहुँ फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग-भाग हमरा दिअ, स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः ।" एहि मन्त्रसँ तीन बेरि सिन्दूर दऽ कऽ गौरीक आवाहन करती। तीनु बेर मन्त्र पढ़ती। तखन जल लऽ-"एतानि पाद्यादीनि नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः ।" एहि मन्त्रसँ सरबाक नीचामे जल देखिन। "इदं रक्तचंदनं नमः स्वामीपुत्र सहित गौर्यै नमः ।" एहि मन्त्रसँ ललका चानन देथिन। "इदं सिन्दूरं नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः ।" एहि मन्त्रसँ सिन्दूर देथिन। तखन "एतानि स्कत पुष्प्याणि नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः ।" बहुत रास लाल फूल चढ़ौती तखन "एतानि विल्वपत्राणि नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः" कहि बहुत रास बेलपात

चढ़ौती। तखन "इदं पुष्पमाल्यं स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः कहि लाल अथवा पीयर फूलक माला चढ़ौती। तखन "एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप, ताम्बुल यथाभाग नानाविधि नैवेद्यानि नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः" कहि नैवेद्यक उत्सर्ग करती। तखन "इदमाचमनीयम् नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः" जल देथिन। तखन "एष रक्तपुष्पाञ्जलिः नमः स्वामी-पुत्र सहित गौर्यै नमः कहिके आँजुर भरि ललका फूल चढ़ौती। अहिना एहि मन्त्र सबसँ सासुर एवं नैहरक गौरीकें पूजा कऽ प्रणाम करती।

कलशकर पूजा

तकर बाद कनियाँ कलशकर पूजा करैत छथि ओ अक्षत ल' "नमः शान्ति कलश इहगच्छ इहतिष्ठ" कहि कलशकैँ आवाहन करैत छथि। तखन "एतानि पाद्यादीनि नमः शान्ति कलशाय नमः" कहि जल जेना गौरीक पूजा केने छलीह तहिना क्रमशः "इदमंनुलेपनम् श्वेत चन्दनम् नमः शान्ति कलशाय नमः" कहिकें उजरा चानन, "इदं रक्तानुलेपनम्" कहिकें ललका, "इदमक्षतं नमः शान्तिकलशाय नमः" कहि अक्षत फेर एहिना फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़बैत छथि। फेर, "इदमाचमनीयम् नमः शान्ति कलशाय नमः" कहिकें जल, "नमः शान्ति कुम्भ महाभाग सर्व-काम-फलप्रद। पुष्पं गृहं शुभ यच्छ पूज्याधार नमोस्तुते। एष पुष्पाञ्जलि नमः शान्ति कलशाय नमः" कहिकें आँजुर भरि फूल दऽ केंँ शान्ति कलशकैँ प्रणाम करैत छथि।

तखन क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा आ नवग्रहक पूजा निम्नवत-"नमः सूर्य इहागच्छ इहतिष्ठ" कहि सूर्यक आवाहन कऽ उपरोक्त प्रकारें यथा-"एतानि पाद्यादीनि नमः सूर्याय नमः" आदि मन्त्र पढ़ि-पढ़िकें क्रमशः हुनका जल, उजरा, ललका चानन, सिन्दूर, अक्षत, ललका फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य चढ़बैत छथि, आचमन करबैत छथि आ लाल फूल सँ पुष्पांजलि दैत छथि।

तत्पश्चात् अक्षत ल' "नमः चन्द्र इहागच्छ इहतिष्ठ ।" कहि चन्द्रमाक आवाहन क' हुनका उपरोक्त ढंग सँ क्रमशः "नमः चन्द्राय नमः" कहि-कहि जल, उजरा चानन, अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य चढ़ा आचमन करा भरि आँजुर फूलसँ मन्त्र पढ़िकें पुष्पाञ्जलि दैत छथि।

तखन फेर अक्षत लऽ "नमो नवग्रह इहागच्छत इहतिष्ठत" कहि, चानन, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य आदि क्रमशः उपरोक्त प्रकारे नाम लऽ "नवग्रहेभ्यो नमः" मन्त्र पढ़ि कए चढ़ाबथि। अन्त मे आचमन कराकैँ पुष्पाञ्जलि दऽ प्रणाम करैत छथि।

विषहारक पूजा

अक्षत लऽ-"नमो नाग दाम्पत्य इहागच्छ इहतिष्ठ" कहि नागभागक

आवाहन कऽ। जल लय-"एतानि पाद्यादीनि नमो नाग दाम्पत्तिभ्यां नमः" इदमंनु लेपनं, इदं रक्त चन्दनं, इदमक्षतं, एतानि पुष्पाणि, इदं विल्वपत्रं, इदं दुर्वादलं, एतानि गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-ताम्बुल, इदमाचमनीयं, एष पुष्पाञ्जलि कहि आँजुर भरि फूल चढ़ा नाग-भाग के प्रणाम करी।

बैरसीक पूजा

पुनः अक्षतसँ उत्तरवरिया मैनाक पात पर "नमः शतानूज सहित वैरस्यै नमः" कहिकें बैरसीक आवाहन कएल जाइत अछि। फेर जल लऽ "एतानि पाद्यादीनि नमः शतानूज-सहित वैरस्यै नमः" मन्त्र पढ़िकें जल, एही तरहे क्रमशः मन्त्र पढ़ि-पढ़ि उजरा चानन, अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि। तखन जलसँ आचमन कराय पुष्पाञ्जलि चढ़ाए बैरसीकें प्रणाम कएल जाइत अछि।

चनाइ नागक पूजा

तखन अक्षत लऽ केंँ बैरसी लगक पूड़ा पर "नमः चनाइ नाग इहागच्छ इहतिष्ठ" ई मन्त्र पढ़िकें चनाइक आवाहन कएल जाइत अछि। तखन "एतानि पाद्यादीनि नमः चनाइ नागाय नमः" मन्त्र पढ़ि जल आर एहिना मन्त्र पढ़ि-पढ़िकें क्रमशः उजरा चानन, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि। "इदमाचमनीय नमः चनाइनागाय नमः" एहिसँ जल, आ "एष पुष्पांजलिः नमः चनाइ नागाय नमः" एहिसँ भरि आँजुर उजरा फूलसँ पुष्पांजलि दऽ चनाइ नाग केंँ प्रणाम कएल जाइत अछि।

कुसुमावतीक पूजा

अब अक्षत लए उत्तरवरिया-पुबरिया पूड़ा पर "नमः कुसुमावती इहागच्छ इहतिष्ठ।" मन्त्र पढ़ि कुसुमावतीक आवाहन कएल जाइत अछि। तखन फेर पूर्ववते "एतानि पाद्यादीनि नमः कुसुमावत्यै नमः" मन्त्र पढ़िकें ललका चानन यथा-"इदं रक्तानुलेपनं नमः कुसुमावत्यै नमः।" सिन्दूर, अक्षत, कुसुमक फूल, बेलपात, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि। अन्तमे "इदमाचमनीयं नमः कुसुमावत्यै नमः" मन्त्र सँ आचमन करा, भरि आँजुर कुसुमक फूल लए मन्त्र पढ़ि पुष्पांजलि दए प्रणाम कएल जाइत अछि।

पिडुलाक पूजा

तखन अक्षत लएकेँ पुबरिया दक्षिणवरिया पूड़ा पर "नमः पिंगले इहागच्छ हइतिष्ठ।" मन्त्र पढ़ि पिंगलाक आवाहन कएल जाइत अछि। उपरोक्त ढंगसँ प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि क्रमशः जल, लाल चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि। आचमन कराओल जाइत अछि आ पुष्पांजलि दए प्रणाम कएल जाइत अछि।

लीली नागक पूजा

तखन गोसाउजिसँ उत्तरक पूड़ा पर लीलीक आवाहन कएल जाइत अछि, अक्षत लऽ "नमः लीली नागे इहागच्छ इहतिष्ठ।" मन्त्र पढ़ल जाइत अछि। आब पुनः पूर्वोक्त क्रमे एक-एक वस्तुक मन्त्र पढ़ि क्रमशः जल यथा "एतानि पाद्यादीनी नमो लीली नागायै नमः" "इदमंनुलेपनं नमो लीली नागायै नमः" "इदं रक्तानुलेपनं नमो" कहि लाल चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य आदि चढ़ाओल जाइत अछि। "इदमाचमनीयम्" ई मन्त्र पढ़ि आचमन करा भरि आँजुर फूलसँ पुष्पाञ्जलिक मन्त्र पढ़ि पुष्पाञ्जलि देल जायत।

शतभागिनी सहित गोसाउनि नागक पूजा

तखन अक्षत लऽ केँ "नमः शतभागिनी सहित गोसाउनि नागे इहागच्छ इहतिष्ठ" मन्त्र पढ़ि दक्षिणवरिया मैनाक पात पर गोसाउनिक आवाहन कएल जाइत अछि। पुनः पूर्वोक्त क्रमे "एतानि पाद्यादीनि नमः शतभागिनी-सहित गोसाउनि नागायै नमः" कहि जल आ क्रमशः प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि-पढ़ि ललका चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि। मन्त्र पढ़ि आचमन तथा आँजुर भरि फूल लऽ पुष्पाञ्जलि देल जाइत अछि। पहिलुक दिनक तोड़ल जाही, जुही आदि सेहो गोसाउनिके चढ़ाओल जाइत अछि।

साठिक पूजा

तत्पश्चात् साठि (षष्ठिका)क पूजा होइत अछि। सराइ व पात पर साठिक मन्त्र लिखि गौरीक दक्षिण साठिक अरिपन पर राखि देल जाइत अछि। तखन अक्षत लऽ केँ "नमः षष्ठी इहागच्छ इहतिष्ठ" कहिकैँ साठिक आवाहन कएल जाइत अछि। तखन उपरोक्त कमसँ जल लऽ केँ "एतानि पाद्यादीनि नमः षष्ठी देव्यै नमः" आ प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि-पढ़ि अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, चढ़ाओल जाइत अछि। तखन "एतानि दूर्वादलानि नमः षष्ठी देव्यै नमः" कहिकैँ साठिटा नहि तऽ कम-सँ-कम छबो गोट दूबि चढ़ाओल जाइत अछि। तखन जल लऽ मन्त्र पढ़ि हुनका आचमन कराओल जाइत अछि आ "एष श्वेत पुष्पांजलि नमः षष्ठी देव्यै नमः" मन्त्र पढ़िकें भरि आँजुर उजरा फूल चढ़ा साठिकें प्रणाम कएल जाइत अछि।

तत्पश्चात् कनियाँ बीनीकें मोटरीकैँ खोंछिमे राखि निम्नलिखित पाँच गोट बीनी क्रमशः तीन बेर सुनैत छथि।

बीनी १

जहियाँ सँ भेल मन-मनारे। बिसहरि खसली शम्भू-भड़ारे ॥

कानथि गौड़ा फोड़थि ढाह। हे दाई बिसहरि राखू नाह ॥

आब तुलाएलि पाँचो बहिनी। सकल शरीर घामि गेल बीनी ॥

बीनी हे विसकर्मा देलनि। देव-दोतलिकें देखाए देलनि ॥

सामिल-बाइल हरे परेखी। बेनी-गुण यति कहब विशेषी ॥

आँतर-आँतर लागल मोती। मुक्ता गाछ पाट के थोपी ॥

चारि कंचन चारि सामिका वरना। से देखि माह हे ! आदित भुलना।

से देखि माई हे ! मालिन भुलना। डाँटी लागि गरुड़ के वाला ॥

सोने बान्हरू-बान्ह करोड़ा। रूपे बान्हू गजमोती माला ॥

जे बीनइ तिन बीनइ सारी। gaha-गुही पलटा दे नारी ॥

अन्हा पाबए नयन-संयुक्ता। कोढ़िया पीबए निर्मल काया ॥

बाँझी नारि पाबए पुत्ता। जे ई बीनी सुनए चित्ता ॥

अनधन लक्ष्मी बाढ़ए वित्त। जे ई बीनी सुनए मन लागि ॥

तकरा वंश नहि हो विष-दोष। तकर पुरुष चलए लछ कोस ॥

जँ एहि बीनीक लागए बसात। बीष-दोष नहि आवए पास ॥

बीनी-२

गोसाउनि दान बड़ि, सोहाग बड़ि, सुन्दर बड़ि, आधा साओन,

जगत गोसाउनि, मधस्थ राजाक बेटी, युगे कुमरक बहिन,

मधु-मधु महानाग-श्रीनाग-नागश्री दाईकैँ पाँच पुत्र कोखि धरि,

नाहर परतारी बैरसी वियाहि, मद्र-मनिका धरहर ढाहि, गोसाउनि

सन भाग, लीली सन सोहाग, सुननिहारि केँ होइनि।

बीनी-३

गोसाउनि दाईकेँ एक ढक छिअनि, पुरिबा-पछबा बसात छिअनि,

कोखिलाक सात छिअनि, भमराक लात छिअनि, मेघडम्बर सन छाती

छिअनि, मुक्तावली पाँती छिअनि।

बीनी-४

बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल पहिल कोन।

बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल दोसर कोन।

बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल तेसर कोन।

बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल चारिम कोन।

बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल पाँचम कोन।

चारू कोना रूना टूना भेल सम्पूर्णा, गौरा दाइकेँ पांचो बेटिया।

भल भाइ शंकर हमहीँ जियाओल गौरी दाइ के बेटी ॥

बीनी-५

दीप दिपहरा जाथु धरा। मोती-मानिक भरथु घरा ॥

नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु। पाँच बहिन बिसहरा बढ़थु ॥

बाल बसन्त भैया बढ़थु। डाढ़ी-खोंढ़ी मौसी बढ़थु ॥

आशावरी पोसी बढ़थु। बासुकी राजा नाग बढ़थु ॥

बासुकिनी माए बढ़थु। खोना-मोना मामा बढ़थु ॥

राही शब्द लए सुती। कौंसा शब्द लए उठी ॥

होइत प्राण सोना कटोरामे दूध-भात खाई ॥

साँझ सूती प्रात उठी, पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी ॥

ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चौँछल बाट।

भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा। ताही बाट आओताह ईश्वर महादेव,

पहल गरुड़ के ढाठ। आस्तीक, आस्तीक, गरुड़, गरुड़ ॥

कनिजाक कथा सुनक नियम

कनियाँ ई पाँचो बीनी तीन बेरि बाद कथा सुनैत अछि जे तेरहो दिन भिन्न-भिन्न होइत अछि। पहिल दिन मौना पंचमीक कथा होइत अछि। कथा सुनलाक बाद अन्तमे एक बेर वाचो बिनी सुनथि-

वाचो बीनी

पुरैनिक पत्ता, झिलमिल लत्ता ताहि चढ़ि बैसली विसहरि माता।

हाथ सुपारी खोंइछा पान, विसहरि करती शुभ कल्याण।

ई पढ़ि पूजित देवता सबके प्रणाम क' बिनीक पोटरा के कलश पर राखि अपन कुलदेवता तखन श्रेष्ठ लोकनि के प्रणाम कऽ पूजा करयवला साड़ी बदलिन, नियम पूर्वक राखथि कारण अही साड़ीके पहिरि आनो दिन पूजा कएल जाइछ। तहन सासुरसँ पठाओल अरबा चाउर, चुड़लाई, दही आदिसँ ऐहब-कुमारिकें भोजन करौती तहन अपने भोजन करतीह। मधुश्रावणी पाबनि भरि कनियाँ साग नहि खेतीह। बेर खन जाही-जूही, फूल पात इत्यादि लोढ़ि पएर-हाथ धो पूजाबला साड़ी पहिरि खोंइछामे बीनीक मोटरी लेती आ तीन बेरि पाँचो बीनी सुनतीह। एक बेरि पुनः वाचो बीनी सुनि पातिलमे दीप लेसतीह, धूप, दीप देथिन। गीत-गाइन लोकनि साँझमे साँझ आ कोबरक गीत गौती। सुविधा लेल पोथीक अन्तमे साँझ आ कोबरक गीत देल अछि।

एहिना पूजा-कथा मधुश्रावणी (साओन सूदि तृतीया) सँ एक दिन पहिने तक होइत रहतैक। पहिल आ अन्तिम दिन छोड़ि आन् दिन ऐहब कुमारिकें खोआएब आवश्यक नहि रहैत अछि।

मधुश्रावणीसँ एक दिन पूर्व कथा समाप्त भेलाक बाद कलश छोड़ि सब देवताक विसर्जन भ' जयतनि। पहिलुका अरिपन आ सब पात पूड़ा हटाए पूजाक स्थानकें नीपि, पुनः पहिनहि जकाँ सब ओरिआओन हेबाक चाही। एहि दिन बरक

उपस्थिति आवश्यक छन्हि। हुनकर परिछनि होएतनि। प्रतिदिन पूजाक बाद बीनी सुनलाक उपरान्त जे भिन्न-भिन्न कथा होइत अछि से यथाक्रम दिनक अनुसार देल गेल अछि।

मधुश्रावणी दिन पञ्चमीए दिन जकाँ सबटा पूजा यथा स्थान करथि। आइ वर नव वस्त्र पहिरि नव पाग दोंपटा राखि कनिजाक पीठ पर हाथ रखने पाछूमे बैसल रहथिन। आइ लीलीके तेरह टा लीलीमौनी उत्सर्ग होएत। जाहि मौनी सबमे निम्न वस्तु सब रहक चाही बड़की अँड़ाँची, दक्षिणी, लवंग, ललका तथा करीका सूतसँ बान्हेल दू गोट बन, एक लाल दोसरु कारी, अएना, ककबा नव पीयर कपड़ा सँ बान्हेल एक गोट डोका जकरा ऊपर सिन्दूर काजर लागल रहक चाही। आइ पबनैतिन गौड़ीके चूड़ा, दही, लाबा, अंकुरी, आम, कटहर, केरा, लताम, कुड़नी पनपथिंया आदि उत्सर्गथि।

पूजा सम्पन्न भेलाक बाद तीन बेर बीनी सुनि श्रीकर राजाक कथा सुनथि तहन गणेशजी द्वारा सोहाग मथबाक कथा सुनथि तहन आम, बेल तथा नीम तीनू काठके बामा हाथे पकरि बामा जाँघ तर कऽ राखि तामामे राखल धान, धनी तथा पानि के मथैत रहथि। कथा समाप्त भेला पर पुनः एक बेर बीनी सुनि जेठ छोटक अनुसार दस गोट अइहब के बामा हाथे तामासँ बहार कऽ धान आ धनीक सोहाग देल जाय। आब बरक हाथे कनियाक पुनः सिन्दुरदान कैल जाइछ तहन कुलक अनुसार टेमी देल जाय।

टेमी देबाक सामग्री ओ विधि

सरबा-१, टेमी-५, आरतक पात-७, पान-७। तहन सरबामे घी राखि टेमी भिजाओल जाइछ। वर अपन दुनू हाथमे एक-एकटा पान आ आरतक पात लऽ लेथि पानक पात जाहिसँ तरमे पैरैक ओहिसँ कनिजाक दूनू आँखि झाँपथि। बिधकरी बीचमे भूर कैल पानक पात तथा आरतक पात कनिजाक दूनू ठेहुन बामा हाथक लुल्हुआ आ दुनू पैर पर साटि देथि ताहि परसँ बीचमे भूर कैल आरतक पाटके साटि देथि। ध्यान राखथि जे आरतक पातक भूर बाटे चमरा देखार रहै तखन एक-एकटा बैरत टेमी पाँचो ठाम सटा देथि।

तकर बाद जल लय पूजित देवता आ नाग लोकनिके विसर्जन करा कनिजा वर पूजाक स्थानसँ उठि गोसाउनिके प्रणाम कऽ सिरहरमे सलामी देथि। कनिजा अइहब कुमारिकें भोजन करा अपने ओहि दिन आ राति अनोन भोजन करथि। गौड़ी पूजाक बैन घरे-घर बाँटथि। साँझमे साँझ आ कोबरक गीत हेतैक आ तकरा बाद निर्मल भसाओल जाय।

मधुश्रावणी व्रत कथा

पहिल दिनक कथा

मौना पंचमीक कथा

एक दिन एक बूढ़ी स्नानक हेतु धार गेला पर देखलन्हि जे धारमे चिकनी पात पर पाँच गोट किछु लहलहाइत छल। ओ जीव बूढ़िके देखि बाजल- हे बूढ़ी। गाम जा लोककें सूचित करियौ जे आइ मौना पञ्चमी थिकैक। आइ लोक पाँच झाक चिक्कनि माँटि आनि, घर आँगन पवित्रसँ नीपि, तेलकूड लगाए, स्नान कए अेंगनामे चिकनी माँटिक पाँच टा थूम्हा बनाबथि। ताहिमे सिन्दुर-पिठार लगाए उपरसहँ दूभि साटि देथि। नव वासनमे खीर-घोरजाउर रान्धथि। बिसहराक पूजा कए हुनका दूध-लावा चढ़ाबथि आ खीर-घोरजाउर उत्सगथि। झोआ नेबो, आमक पखूआ, अमतौआ दाड़िम, नीमक पात, नेउरा कुश आ धार्मिक पात आदि चढ़ाबथि। ई सब केलाक बाद आइ सब केओ तीतकोत खाए खीर-घोरजाउर खाथि। घरक दुआरिक दुनू भाग गोबरसँ फेंच काढ़ने नागक चित्र बनाए, ओकर मुँहमे दही आ दूभि लगा देथि। जे केओ एहि तरहँ पाबनि करती तिनका सब प्रकारक कल्याण हेतन्हि आऽ जे ऐना नहि करती तिनका हानि होयतनि।

बूढ़ी नहाकें आड़न एलीह तऽ गाममे सबको कहि देलथिन। गामक किछु लोक ई पाबनि नहि केलक आऽ किछु लोक एकरा फूसि-फटक बुझि अनठाए देलक पाबनि नहि कएलक। जे सब पाबनि केलक से सब ठीक रहल आ जे सब नहि केलक से सब रातिेमे मरि गेल। गाममे हाहाकार मचि गेल। हारिकें लोक सब फेर बूढ़ीक ओताए आयल आऽ पुछलक जे अब कोन उपाय सँ मुइल लोक सब जीवित होएत। बूढ़ीके किछु नहि फुरलनि तँ फेर दौड़लि धारक किनार गेलीह। ओतय चिकनी पात पर पाँचो जीव ओहिना लहलहाइत छल। ओ पाँचो बहिन बिसहरा छलीह। बूढ़ी हुनका प्रणाम कए गामक सब वृत्तान्त सुनाए पुछलनि जे मुइलहा लोक सबकें पुनः जिएबाक कोन उपाय कएल जाए।

बिसहरा कहलनि जे पहिने तऽ हमरा अनुसारे ओ सब पाबनि नहि केलक तैँ सब मरि गेल। अब एकै उपाय अछि। गाममे जँ ककरो कराहीमे खीर-घोरजाउर लागल होइक तँ ओकरा घोरिकें मुइल लोक सबके चटा देबैक, इहो बुझा देबैक जे अगिला पञ्चमीकें नाग-पञ्चमी होएतैक। ओहि दिन सब नियमपूर्वक पाबनि करए, तखनहि कल्याण होएतैक।

बूढ़ी गाममे घरे-घरे कराहीमे लागल खीर-घोरजाउर ताकि मुइलहा सबकें चटाओल, तखन पुनः ओ सब जीवि गेल। अब ओहो सब प्रसन्न भए बिसहराक बुझाओल अनुसारें पाबनि करए लागल आऽ आनन्द सँ रहय लागल। मुइलहा लोक सब पुनः जीबि उठल आ नाग पञ्चमीक दिन पाबनि केलक से “मड़ए” कहौलक।

बिसहराक जन्म

एक दिन महादेव गौीरक संग सरोवरमे जल-क्रीड़ा करैत छलाह। संयोगवश हुनक वीर्यस्खलन भए गेल। महादेव ओकरा एक पुरैनिक पात पर राखि देलनि। ओहिसँ बिसहरा पाँचो बहिनक जन्म भेल। महादेवकें एहि पाँचो बहिन पर ममता होएब स्वाभाविक छल। ओ नित्य ओहि सरोवरमे स्नान लेल जाथि आ बड़ी-बड़ी काल तक ओहि साँपक पोआ संग खेलाथि। गौीरकें सन्देह होमए लागल जे महादेव एतेक काल तक पोखरिमे की करैत रहैत छथि। एक दिन ओ महादेवक पाछू-पाछू गेलीह तऽ देखलनि जे महादेव पोआ सभक संग खेलाइत छथि। ई देखि गौरी तमसाए गेलीह। ओ पोआ सबकें पैरसँ पीचि-पीचिकें फेकए लगलीह। महादेव मना कएलनि जे ई सब मारबाक पात्र नहि थीक, ई सब अहाँक बेटी थीक। ई सब अनेको कष्ट दूर करत आ कहियो अहुँक उपकार करत। मर्त्यभुवनमे साओन मासमे एकरा सभक पूजा होयत। जे ऐ पाँचो बहिनक पूजा करत तकरा साँपक डर नहि रहतैक। ओ धन धान्यसँ पूर्ण होयत आ ओकरा सब तरहें कल्याण होएतँक। हम एहि पाँचो बहिनक नाम रखने छी जाया, बिसहरि, शामिलबारी, देव आ दोतलि।

दोसर दिनक कथा

बिहुला ओ मनसाक कथा

मनसा महादेवक मानस पुत्री छलीह। ओ जनमितहि युवती भए गेलीह। नाङ्गरि रहलाक कारणे हुनक लाजक रक्षा हेतु साँप हुनका देहमे लेपटाय गेल। ऐ सबसँ गौरी अप्रसन्न भए गेलीह। तैँ हेतु मनसाकें कैलाश त्यागि अन्यत्र जाए पड़लनि। महादेवक कृपाँस आ मर्त्य-भुवन चलि ऐलीह। हुनक इच्छा छल जे लोक हुनक पूजा करए। ओहि समयमे मर्त्य-लोकमे चन्द्रधर (चन्दू) नामक एक पैघ सौदागर रहए। पैघक देखाउसि आनो लोक करैत अछि। तैँ मनसाक मोनमे भेल जे पहिने चन्दूए हमर पूजा करए तऽ देखा-देखी आनो हमर पूजा करए लागत। चन्दू महादेवक परम भक्त छल। ओ महादेव छोड़ि आन देवताक पूजा करब नहि गछलक। ओकर उत्तर छल “जे दहिना हाथ महादेवकें देने छियनि, बामा हाथे हम अहाँक पूजा कए सकैत छी।” मनसाकें ई नहि जँचल। ओ तमसा गेलीह। चन्दूक छओ गोट बेटाकें ओ साँप डसबाकें मारि देलनि। चन्दूकें बूढ़ारीमे पुनः एक बेटा भेल। हुनक टिप्पनि देखि ज्योतिषी कहलक जे इहो बेशी दिन नहि जीप्ताह। हिनका विवाहक दिन कोबरहिमे साँप डँसि लेत। चन्दू अत्यन्त दु:खी भेलाह किन्तु साध्य कोन। ओहि बेटाक नाम लक्ष्मीधर (बाली लखन्दर) पड़ल। लक्ष्मीधर कें छवे मास भेला पर चन्दू अपन पत्नीक जिद्द पर एहन कनियाँस करवाले विवाह प्रस्तुत भए गेलाह, जकर टिप्पणिमे चिर-सोहागिन योग छलैह। ओ पहाड़ पर एकटा एहन कोठा बनबौलनि, जे सब दिससँ निमुन छलैक। बिज्जी आ बिढ़नीक पहरा पड़ल जे ओहि परोपट्टामे कोनो साँपकेँ नहि आब' देतै। ओहि कोठामे लखन्दरक विवाह बारह वर्षक परम सुन्दरि आ सुलखणि कनियाँ बिहुलासँ भेल। जखन ओ कनियाँक संग कोहबर करैत रहथि। तखने कोनो बाटे एकटा साँप आबि हुनका डँसि लेलक। लखन्दर तत्काले मरि गेलाह। लोक सब हुनका संस्कार लेल गंगा कात लए गेल। बिहुला परमै सती छलीह, ओहो स्वामीक संग श्मसान घाट चलि गेलीह। लोक सबके ओ मुर्दा गाड़य नहि देलन्हि। ओ सबकें कहलथिन जे हमरा जेना होएत तेना हम हिनका जिआएब। बिहुला केराक थम्ह केर एक नाव बना ओहिमे शवक संग अपनहुँ बैसि गेलीह आ गँगामे नावकें भसिया देलनि। लोक सब बहुत मना केलक लेकिन जिद्द देखि अन्तमे लोक हुनका अपना भाग्य पर छोड़ि देलक। ओ बिना अन्न-जलक गंगामे मुर्दा संग कइएक दिन तक भसियाइत रहली। शवके माँस गलि-गलि खसए लागल। केराक थम्ह सड़ि कए टूटए लागल। भसियाइत-भसियाइत ओ बेढ़ प्रयाग पहुँचल। बिहुला ओतय त्रिवेणी घाट पर एक धोबिनके कपड़ा खीचैत देखलनि। ओकरा संग एक चिल्हका छलैक। ओ चिल्हका ओकरा दिक्क करैत छलैक बीच-बीचमे नुआ खोचि लैत छलैक। अन्तमे धोबिन ओकरा जानसँ मारि खीचल साड़ी तरमे झौंपि देलक। फेर जखन कपड़ा खीचल भए गेलैक, तखन चिल्हकाकें जिआए देलक आ' ओकरा काँख तर लए माथ पर नुआक मोटा उठाए घर विदा भेल। बिहुलाकें भेलनि जे एहि धोबिन सँ हुनक काज भए सकैत छनि। ओ ओहि दिन ओतय रूकि गेलीह। दोसर दिन जखन धोबिन फेर घाट पर आएल तखन बिहुला अपन सब हाल ओकरा कहलथिन्ह आ ओकरा सँ अपन स्वामी के पुनः जीवित करबामे मददि मंगलथिन्ह। बिहुलाक सिन्दुरता, धैर्य आ' साहस देखि धोबिनकें दया आबि गेल। धोबिन बिहुलाकें संग लए इन्द्रक दरवार पहुँचल। ओताए आनो देवता सब छलाह। बिहुला सब देवताकें अपन वृत्तान्त सुनौलनि आ अपन स्वामीक प्राणदानक भीख माङल। देवतागण बिहुलाक व्यवहार देखि प्रसन्न भए गेलाह आ' हुनका दया आबि गेल। ओ सब बिसहरा (मनसा) के बजौलनि आ चन्दू सौदागरक अपराधकें क्षमा कए देब' कहलथिन। बिहुलो बिसहराक पैर पकड़ि विनती केलनि आ आँचरि पसारि कबुला कएलनि जे यदि पति-सहित हुनक छबो भैंसुर जीवि उठता तऽ ओ अपन ससुरकें मना कऽ पूर्ण समारोहक संग बिसहराक पूजा करतीह तथा मर्त्य-भुवनमे हुनक प्रचार करतीह।

बिसहरि माता प्रसन्न भए सबकें जीवि जेबाक वरदान दए देल। इन्द्र महाराज लक्ष्मीधर सहित सातो भाईकें यमपुरी सँ बाहर करबाक आज्ञा देलनि। सातो भाई केँ नव शरीर दए बिहुलाक संग लगा देल गेल।

चन्दू सौदागर बेटाक शव सँ मरणांसत्र भए गेल छलाह। देखनिहारक अभावमे धनो बीत बोहा गेलनि। अकस्मात सातो बेटाक संग पुतहु केँ आएल देखि आनन्द विभोर भ' गेलाह। हुलसि केँ सातो बेटा ओ पुतहु के गर लगाओल। बिहुला सँ सब हाल बुझि हुनका आशिर्वाद सँ ओतप्रोत कए देलनि। खूब धूमधाम सँ बिसहराक पूजा कएलनि, सबके हकार आ निमन्त्रण देल। बिसहराक महिमाक गुण गान, हुनक पूजाक प्रचार कएल गेल। अनेको स्थान पर हुनक मन्दिर बनाओल गेल। ओहि दिन सँ मर्त्य-भुवनमै बिसहराक पूजा होमय लागल। गाम-गाममे हुनक गहवर बनल आ लोक सब ढोल बजाए, भीख माँगि बिसहराक गीत गाबि पूजा करब प्रारम्भ कएलक।

बिसहराक कथा

कद्रू नामक स्त्रीसँ कश्यप मुनिकें एक हजार साँप संतान भेल आ' ओ सम्पूर्ण संसारमे पसरि गेल। ओ सब बड़ उत्पाती छल, लोक सबकें डँसऽ लागल, लोक अनधुन मरए लागल। ई देखि ब्रह्मा चिन्तित भेलाह जे यदि साँप एना करत तँ हमर सृष्टिये समाप्त भए जाएत। ब्रह्मा कश्यप मुनि कें एकरा सँ त्राणक उपाय करए कहलथिन। कश्यप मुनि साँपक विष झाड़बाक मन्त्र बनाओल। ओ मन सँ तपस्या कए बिसहराक सृष्टि कएल। तँ ओ मनसा देवी कहाओल। किछु पैघ भेला पर ओ महादेव लग कैलाश चलि गेलीह। ओताए बहुत तपस्या केला पर महादेव प्रसन्न भए हुनका ज्ञान आ मंत्र देलनि आ पुष्करक्षेत्र जा कें तपस्या करबाक सुझाव देलनि। ओताए तीन युग धरि श्रीकृष्णक तपस्या केला पर ओ सिद्ध भए गेलीह। एतए ओ सिद्धयोगिनि कहाओल। एखन तक हुनक विवाह नहि भेल छल। तपस्या सँ हुनक देह सुखाकें जीर्ण भए गेल तऽ हुनक नाम जरत्कारू पड़ि गेल। तखन हुनका जरत्कारुए नामक बूढ़ तपस्वी ब्राह्मण सँ विवाह भेलनि। ताहि सँ हुनका आस्तीक नामक पुत्र भेलनि। राजा जन्मेजयक प्रसिद्ध सर्पयज्ञमे अनेक सर्प मरल किन्तु सब साँपकेँ आस्तीक मुनि अपन प्रभाव सँ बचा लेलनि। अषाढ़क संक्रान्ति सँ नाग-पंचमी धरि बिसहराक पूजा पसीझक पात पर होइत अछि। बिसहरा-पूजा केला सँ लोँक कें धन-धान्यक वृद्धि होइत छैक आ साँपक डर नहि रहैत छैक। बारह नाम सँ बिसहरि विख्यात छथि-जगद्गौरी, मनसा, जरत्कारु, वैष्णवी, सिद्धयोगिनी, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारु-प्रिया, नाग-भगिनी, आस्तीक माता, बिसहारा आ महाज्ञानयुता। ई बारहो नाम लैत रहला सँ लोक कें अपना आ ओकर सन्तान केँ सर्पदंशक भय नहि रहि जाइत छैक। ई बारहो नाम पढ़ला सँ साँप भागि जाइत अछि।

मंगला गौरीक कथा

श्रुतिकीर्त्ति नामक एक राजा छलाह। हुनका बेटा नहि छल-ओ एहि लेल चिन्तित रहैत छलाह। अन्तमे भगवतीक आराधना केनाई शुरू केलनि। भगवती प्रसन्न भए हुनका वरदान माँगए कहलनि। राजा नतमस्तक भए कहलनि, “हे माता, अहाँक दयासँ हमरा कोनो चीजक कमी नहि अछि, मात्र एक पुत्र छोड़ि। यदि अहाँ हमरा सँ प्रसन्न छी तँ हमरा एकटा पुत्र दिअ'।” भगती बजलीह, “हे सेवक, तोरा सँ हम अत्यंत प्रसन्न छी, किन्तु तोरा भाग्य मे बेटा नहि लिखल छह। तथापि हम तोरा बेटा देबह। यदि सर्वगुणी बेटा लेबह तऽ ओ सोलह वर्ष जीतह आ यदि चिरंजीबी बेटा लेबह तऽ महामूर्ख होएतह। आब कहह केहेन बेटा लेबह? भगवतीक बात राजाकें सोचमे ध' देलक। ओ रानी सँ विचार कएलाक उपरान्त सर्वगुणी बेटाक वरदान मँगलनि।

भगवती हुनका आदेश देल-'हमर मन्दिरक दुआरि पर जे आमक गाछ छैक ताहिमे सँ एकटा आम तोड़ि केँ अपन पत्नी केँ खुआ दहक लगले हुनका गर्भ रहि जेतनि।'

राजा खुशी-खुशी रानीकें भगवतीक आदेशानुसार खुओलनि। रानी कें गर्भ रहल। समय पर हुनक कोखिसँ सुन्दर बालकक जन्म भेल। ओकर नाम राजा “चिरायु' राखल। समय बीत' लागल। भगवतीक कथनानुसार राजकुमार पढ़ि-लिखि सर्वगुण सम्पन्न भए गेल। माए बाप अरिजन-परिजन सबके अपन व्यवहार सँ प्रसन्न राखए लागल। देखतौहि-देखतौहि राजकुमार के सोलहम वर्ष आबि गेल। राजाकें चिन्ता बढ़ि गेल। बेटाक मृत्यु अपने सोझाँमे कोना देखता? राजा राजकुमार केँ अपन सारकें सुपुर्द कए देल आ कहल जे अहाँ हिनका काशी लऽ जाउ। जाबत जीबथि ताबत हिनका सुख सुविधाक पूर्ण ध्यान राखब। मरणोपरान्त हिनका राजकुमारक योग्य सम्मान सहित मणिकण्डिका पर दाह संस्कार क्रिया कर्म कए घुरि आएब।

माम-भागिन काशीक रास्तामे जाइत-जाइत आनन्दनगर पहुँचलाह। ओतय वीरसेन नामक राजा राज करैत छलाह। हुनका मँगला गौरी नामक एक सुन्दरि आ सुलखणि कन्या रहथिन। हुन्कर विवाह आइए राति होएबा लेल छलनि। राजकुमारी फुलवाड़ीमे सखि सभक संग गौरी पूजा हेतु फूल लोढ़ैत छलीह। गप्पे-सप्पेमे कोनो सखी तमसा कए राजकुमारीकें “राँड़ी” कहि देलक दोसर सखि सब एहि पर ओकरा खूब फज्झति केलक जे एहन शुभ दिनमे एहन अशुभ बात ओ राजकुमारीके किएक कहलक। किन्तु राजकुमारी कहि उठली-“दुर एकरा राँड़ी कहने की हम विधवा भए सकैत छी। हमरा कुलमे तऽ आइ धरि केओ राँड़ नहि भेल अछि। हमरा ओताए तऽ सब केओ गौरीके तेनाकें गोहरौने रहैत छी जे विधवा होएब असम्भव। वरण हमरा हाथक अक्षत जाहि वरक माथ पर पड़ि जेतैक तऽ ओ यदि अल्पायुओ रहत तँ गौरीक कृपा सँ चिरायु भए जाएत।'

संयोगक बात जे चिरायु मामाक संग ओही फुलबाड़ीमे ठहरल छलाह। राजकुमारीक गप्प हुनका दूनू गोटेक कानमे पड़ल। मामा जी सोचलनि जे यदि एहि राजकुमारीक संग हुनक भागिनक विवाह भए जाइत तँ अल्पायु रहैत चिरायु भय सकैत छथि। संयोग एहन जे राजकुमारीक विवाह बाह्नीक देशक राजा दृढ़वर्माक बेटा सुकेतु वर्मा सँ होएब निश्चित छल। वर-वरियाती साँझखन ओही फुलबाड़ीमे डेरा खसौलक। सुकेतु वर्मा परम कुरूप मुर्ख आ बहीर छलाह। वरक बाप पित्ती विचारलनि जे एहन कुरूप मूर्ख यदि मड़वा पर जाएत तँ कन्या वला वरकें घुमा देत। तैँ हेतु कोनो सुन्दर वरकें लए मड़वा पर जेबाक चाही। विवाहक बाद मारि पीटिकें ओकरा भगा देब आ सुकेतुकेँ कोवरमे वैसा देबनि।

ताबत बरियाती सभक नजरि सुन्दर भव्य चिरायु पर पड़ल। ओ सब भरि राति लेल मामा सँ चिरायुक याचना कएलक। मामा तऽ मनेमन ई चाहिते छलाह। ऊपर सँ थोड़ेक काल नाकर नुकुर केलनि पुनः अनुमति दए देलनि।

आब बरियाती लोकनि सुकेतुकेँ डेरा पर छोड़ि मंगनीक वर चिरायुक संग लय विवाहक स्थल पर पहुँचलाह। शुभ-शुभकए सब कार्य सम्पन्न भेल। गौरीशंकरक प्रतिमाक समक्ष सिन्दुर-दान भेल। वर चिरायु मँगला-गौरीक संग कोबरमे सुतलाह।

आइए राति चिरायुकेँ सोलहम वर्ष पुरि गेलैन। निशा रातिमे काल गहुमनक रूप ध' कोवरा घर पैसि गेल। राजकुमारीकें ताबत नींद नहि आएल छलनि। ओ भयंकर गहुमनकें देखि भयभीत भए गेलीह किन्तु साहस क' भरि बाटी दूध साँपक आगूकें बढ़ा देलनि आ प्रार्थना कएल जे नागराज हुनक पतिकें प्राण नहि लेंथि वरण हुनका चिरंजीबी बना देथि, तऽ आजीवन ओ नागराजक पूजा करती आ व्रत रखतीह।

साँप राजकुमारीक गोहारि मानि गेल। ओ दूध पीबि, ओतहि राखल पुरहर मे पैसि गेल। राजकुमारी तुरंत अपन केचुआ (आँगी) खोलि पुरहरक मुँह बान्धि देलनि। ताबत चिरायुक नींद तुटलनि आ राजकुमारीसँ किछु खयबाक लेल मँगलनि हुनका बड़ भूख लागि गेल छलनि। कन्या अपन मायसँ खीर आ लड्डू आनि हुनकर भूखके तृप्त कएल। वरकें हाथ धोअ' काल हुनका आँगुरसँ पञ्चरत्नक औँठी खसि पड़लनि जे कन्या अपन आँगुरमे पहिरि लेलनि। वर पान-सुपारी खा पुनः सूति रहलाह।

बादमे जखन राजकुमारी साँपवला पुरहरकेँ फेकए गेलीह तऽ देखलनि जे साँपके स्थान पर एक गोट रत्नहार चकचका रहल अछि। ओ ओहि हारकें अपन गरदनिमे पहिरि लेलनि।

भोर भेला पर माम चिरायुके वापस लए गेलथिन आ वरियाती सब सुकेतुके कोवरमे पैसाबए चाहलक। राजकुमारी मँगलागौरी ई कहि हुनका रोकि देलनि जे ओ हुनकर पति नहि छथि। हुनक विवाह आन ककरो संग भेल छल। वर पक्षवला सब अड़लाह आ सबूत मँगलनि। मँगलागौरी कहलनि जे रातिमे हुनका एक औँठी आ एक हार भेटल छल। वर बाजथु जे ओ सब केहन छल, आ रातिमे ओ की सब केलनि आ हुनकासँ की सब गप्प केलनि। सुकेतु एको बातक उत्तर नहि दए सकलाह। अन्तमे हारि मानि वरपक्षवला चल गेल। राजा वीरसेन जखन सब चक्रचालि बुझलनि तखन स्तम्भित रहि गेलाह। राजा राजकुमारीक असली वरकें चिन्है लेल हुनक वास कोठा पर देलनि। ओताए एक चिक लगाए देल गेल जतएसँ ओ कन्या लोक सबके देखैत रहतीह। राजाक धारणा छल असली वर अपन वियाही स्त्रीके खोजमे कहियो ने कहियो अवश्य आओत। तखन राजकुमारी हुनका चीन्हि जएथिन।

अन्तत: सएह भेल। चिरायु अपन मामक संग काशी, प्रयाग, विन्ध्यांचल आदि होइत एक वर्षक बाद ओताए एलाह। देखैत देरी राजकुमारी चिचिआ उठली जे ओएह हुनक वर जाइत छथिन, ओएह हुनक प्राणनाथ जाइत छथि। वीरसेन दुनू माम भागिनके कोठा पर बजाओल। राजकुमार राजकुमारीक प्रत्येक प्रश्नक उत्तर ठीक-ठीक देल।

राजा आनन्दित भए अपन सर कुटुम्बके बजा पूर्ण धूमधामसँ विवाहक उत्सव मनाए वर-कन्याके नाना प्रकारक आभूषण, हाथी, घोड़ा, सर-सिपाही संग लगाए विदा कएलनि। चिरायु सब सामान लऽ कन्या सहित अपन राजधानी पहुँचलाह। राजा-रानी जखन सुनलनि जे हुनकर बेटा-पुतहु आबि रहल छथि तऽ पहिने विश्वासे नहि होइन। कारण चिरायुके मुइला तऽ आब वर्ष पुरयपर अछि। लेकिन जखन बुझलनि जे बात सत्य अछि तऽ आनन्दक पारावार नहि रहल। ता बेटा पुतहु आगू आबि राजा-रानीके प्रणाम कयलकनि। पुतहु मँगला-गौरीके सासु भरि-पाँज क' कोरमे बैसौलनि। मँगला गौरी हुनका अपन नैहरमे गौरी पूजाक रेबाज तथा कोना हुनकर अनुकम्पासँ सब कियो सतत सुहागिन रहैत छनि से कथा कहि सुनौलनि। तैँ गौरी आ' नाग पूजाक सधवाक जीवनमे बड़ महत्त्व अछि।

तेसर दिनक कथा

पृथ्वीक जन्म

ब्रह्मा, विष्णु आ आनो देवता सब एक दिन सभा कए विचार कएलनि जे संसारमे पाप ततेक पसरि गेल अछि जे पृथ्वी भागि क' पाताल चलि गेल छथि। हुनका कोनो तरहँ ऊपर आनक चाही तखनहि संसार बसि सकैत अछि। सब मिली पाताल गेलाह आ पृथ्वीसँ प्रार्थना कएल ऊपर अएबा लेल। पृथ्वी कहलथिन्ह- “लोक हमरा ऊपर रहैत अछि आ' हमरे ऊपर मल मूत्र त्याग करैत अछि। एहिसँ हमर अपमान होइत अछि जे हमरा सह्य नहि अछि।” देवता लोकनि कहलनि- “अहाँ एकर चिन्ता नहि करू। जे अहाँक ऊपर मल-मूत्र करत आ ओकरा देखि लेत, तकरा स्वयं ओकर पाप होएतैक। जे अहाँसँ बिना क्षमा मँगने अहाँक ऊपर पैर रोपत सेहो पापक भागी होएत।” देवता लोकनिक अनुनय-विनय पर जखन पृथ्वी ऊपर एलीह, तखन डगमगाइत छलीह। तखन विष्णु भगवान काछुक रूप धारण कए अपन पीठ पर राखि लेलनि।

समुद्र-मन्थन

देवता लोकनि सुमेरू पर्वत पर समुद्र-मन्थनक विचार विमर्श लेल एकत्र भेलाह। विष्णुक विचार भेल जे ई कार्य देव-दानव सब मिलिकें करथि। हुनके विचारसँ वासुकी नाग बजाओल गेलाह। ओ मन्दराचल पर्वतमे अपन देहकें लपटाए ओकरा उखाड़ि समुद्रक कात लए आनल। ओ समुद्र-मन्थनसँ प्राप्त अमृतमे हिस्सा भेटवाक लोभे मन्थनक कष्ट सहबा लेल प्रस्तुत भेलाह। आब प्रश्न उठल जे एतेक भारी मंदर यदि समुद्र मे खसाओल जाएत तँ ओ डूबि जाएत। तँ कोनो आधार होएबाक चाही जाहि राखिकें मन्थन कएल जाए। ई भार देवता ओ दानवक आग्रह कएला पर कूर्मराज (कच्छप) गछि लेलनि। मंदराचलकें मथनी बनाओल गेल आ वासुकी नागकें ओकर रस्सी। समुद्रमन्थन आरम्भ भेल। नागक फॉफ दिशा दानव सब पकड़लनि आ' पुच्छ दिश देवतागण। समुद्र मन्थनसँ समुद्रक जीव जन्तु सब पिसाए लागल आ मंदारक उपरका गाछ सब आपसी रगड़ सैं टूटि-टूटि खसए लागल। ओहि रगड़सँ पर्वत पर आगि लागि गेल तँ ओहि परहक जड़ी-बूटी, सोना-चाँदी, मूँगा-मोती आदि जरि कए भस्म भऽ गेलैक। देवदानवकें गमीँसँ व्याकुल देखि इन्द्र वर्षा करय लागल। वर्षासँ अमृतमय सब भस्म धोखरि-धोखरि समुद्रमे खसल लागल। एहिसँ समुद्रक नोनगर पानि दूध भए गेल आ अधिक काल तक मथलासँ घी भए गेल। एहि प्रकारें आरो अधिक काल तक मथलासँ घी भए गेल। एहि प्रकारे आरो अधिक काल तक मथलासँ समुद्रसँ लक्ष्मी, सुरा (मदिरा), उच्चैश्रवा घोड़ा निकलल जे चन्द्रमा लोकनि हथिया लेलनि। तत्पश्चात अमृत लेने धन्वन्तरि प्रकट भेलाह। तखन विष निकलल ओकर धाहसँ देव-दानव सब मूर्च्छित होमय लागल। तखन हाहाकार मचि गेल। अन्तमे विष्णुक निहोरासँ महादेव सबटा विषकें घोंटि गेलाह। ओहो शीघ्रहि बेहोस भए गेलाह। तखन गौरीक निहोरा-मिनती पर बिसहराक संग बहुत रास साँप, बिढ़नी, चूटी आदि जाक' महादेवक शरीरसँ विष निकाललक। अन्तमे महादेवक अनुरोध पर कंठमे कनेक विष छोड़ि देलक जाहिसँ हुनक कंठ कारी भए गेल। तहिये सँ ओ नीलकंठ कहाबए लगलाह।

अमृत लेल देवता आ दानवमे झगड़ा होमय लागल। दानव सभक कहब छल जे समुद्रसँ बहरायल सब वस्तु तँ देवता सब लइये लेलनि, किन्तु जाहि अमृत लेल सब एतेक परिश्रम केने छलाह ताहिमे हुनको सभकें हिस्सा भेटबाक चाही। देवता सबकें ई डर छल जे बिना अमृत पीनहि दानव सब बहुत बलिष्ठ छल आ' कैक बेर देवता सबकें परास्त कऽ स्वर्गसँ भगा देने छल। यदि ओ सब अमृत पीबि लेत तखन तँ अमर भए जाएत आ सदिखन हुनका सबकें दबौने रहत। ई सोचि भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कए दानव सबकें मोहबाक लेल हुनका सभक आगू ठाढ़ भै गेलाह। दैत्य मोहिनी स्त्रीसँ मोहित भ' अमृत उठाए हुनके हाथमे राखि अस्त्र-शस्त्र ल' देवता लोकनिसँ युद्ध करए दौड़ल। तावत् भगवान नारायण देवता सबकें अमृत पिया देलनि। देवते लोकनिक रूप धए राहु नामक दैत्य सेहो अमृत पीबए लागल, किन्तु चन्द्रमा आ सूर्य ओकरा चिह्नि गेलाह आ' भगवान विष्णुकें कहि देलनि। यावत् ओकरा कंठमे अमृत जाइ तावत् विष्णु अपन चक्रसँ ओकर गर्दनि काटि देलनि। अमृतक स्पर्श भेलाक कारणे ओ मरि नहि सकल किन्तु दूई भागमे विभक्त भए मुण्ड “राहु” आ धड़ “केतु” कहओलक। तहिसँ ओ सूर्य आ चन्द्रमाक शत्रु भएँ गेल ! तँ एकनहु धरि ओ कहियो-कहियो अमावस्यामे सूर्यकें आ पूर्णिमामे चन्द्रमाकें गीड़ि लैत अछि जाहिसँ सूर्यग्रहण आ चन्द्रग्रहण होइत अछि। जेँ ओकर धड़ कटल छैक तँ सूर्य-चन्द्रमा फेर बाहर भए जाइत छथि।

देवगणकें अमृत पिऔलाक पश्चात भगवान विष्णु अस्त्र-शस्त्र लए दानव सबसँ घमासान युद्ध क' ओकरा सबकें मारि काटि पाताल भगाए देलनि। बचल अमृत इन्द्रकें सुपुर्द कए देल ओ' विश्वकर्माकें ओकर रखवारिक भार देल गेलनि।

समुद्र मन्थनमे वासुकी नाग रस्सीक कार्य कइने छलाह। हुनका देवता लोकनिसँ ई वरदान भेटल जे हुनका माइक श्राप नहि लगतन्हि आ' ओ सपरिवार जनमेजय महाराजक यज्ञमे नहि जयताह। हुनकर भागिन आस्तीक मुनि हुनक रक्षा करथिन।

चारिम दिनक कथा

सतीक कथा

ईश्वर सृष्टि करबाक इच्छासँ पहिने विष्णु तखन महादेव आ अन्तमे ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलनि। ब्रह्माकें सृष्टि करबाक भार भेटल। तपस्या बलसँ ओ अपन शरीर सँ देवता आ ऋषि-मुनि, मुहसँ सतरूपा नामक स्त्री सहित स्वयंभुव मनु, दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि आ दहिना पाँजरसँ दक्ष प्रजापतिक जन्म देलनि। आब ब्रह्माक सन्तानो सब सृष्टि करए लगलाह मरीचिक बेटा कश्यप भेलाह आ अत्रिक पुत्र चन्द्रमा। मनुकें दू बेटा प्रियब्रत आ उत्तानपाद। तीन बेटी आकृति, देवहुति आ प्रसूति भेलथिन। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ भेल। ताहिसँ साठि कन्याक जन्म भेल। ओहिमे आठ कन्याक विवाह धर्मसँ, एगारह केर रुद्रसँ, तेरह कश्यपसँ, सत्ताइसटाक चन्द्रमा सँ आ एक गोट सती नामक कन्याक विवाह महादेवसँ भेलनि। चन्द्रमा अपन स्त्री सबमे रोहिणीकें सभसँ बेशी मानैत छलथिन। तँ बाँकी छब्बीसो बहिनकें हुनकर बहुत डाह होइत छलनि। ओ सब अपन पिता दक्षकेँ एकर उलहन देलथिन। दक्ष आसन जमाए चन्द्रमाकें बुझेबाक चेष्टा कयलन्धि। किन्तु ओ निष्फल भेल। दक्ष क्रोधसँ हुनका सराप दए देलनि-'अहाँकें क्षय रोग भए जाएत आ सम्पूर्ण शरीर गलि जाएत।' चन्द्रमाक शरीर दिन-दिन गलय लागल। ओ देवता सबसँ गोहारि लगौलनि, किन्तु केओ हुनकर रक्षा नहि कएलनि अन्तमे ओ अपन साढ़ू महादेवक शरणमे गेलाह। तावत् चन्द्रमाक देह बहुत गलि गेल छल, किछुए बचल छल महादेव हुनका अपन कपार पर चढा लेलनि। हुनकर देह गलनाइ बंद भए गेल। तखन दक्षकें एकर पता लगलनि तँ ओ दौड़ल महादेव लग गेलाह आ' हुनका चन्द्रमाकें अपन माथ परसँ उतारि देबऽ लेल कहलथिन। महादेव ई बात अस्वीकार कए देलनि। ओ अपन शरणागतक तिरस्कार नहि कए सकैत छथि। दक्ष प्रजापति तहियेसँ अपन जमाए महादेवसँ असौंजन कए लेलनि। दक्ष अपन तामसकें देखबे लेल एक पैघ यज्ञक आयोजन कयलनि। ओहिमे सब देवता आ मुनिकों नोत देलनि किन्तु 'महादेवकें' छोड़ि देलनि। यज्ञ प्रारम्भ भेल। लोक सब देखबा लेल ओम्हर जाए लगलाह। देवतागण अपन विमानसँ चलंलाह। सबकें अपन नैहर दिश जाइत देखि सती महादेवकें ओकर कारण पुछलथिन। सती जखन बुझलनि जे हुनके नैहरमे एतेक पैघ यज्ञ भए रहल अछि तँ ओ महादेव सँ बिना नोतो ओतय जाय लेल जिद्द ठानि देलनि। अन्तमे महादेव हुनका अपन सेवक वीरभद्रक संग नैहर पठा देलथिन।

सती जखन अपन पिताक यज्ञस्थलीमे पहुँ चलीह तँ केँओ हिनका बैसहु तक लेल नहि कहलकनि। सब हिनका दिश ताकि-ताकि कनफुसकी करय लागल अन्तमे जखन सती सब देखैत-देखैत आ महादेवक निन्दा सुनैत-सुनैत असह्य भए गेलीह तखन सती धधकैत यज्ञकुण्डमे कुदि आत्मदाह कए लेलनि। स्वाभाविक छल जे हुनकर संग वीरभद्र ओतय भारी उत्पात मचय लगल। दक्षक गरदनि काटि लेलक। यज्ञ मण्डलकेँ तहस-नहस कए देलक। देवता आ मुनिगणकें मारि भगौलक। महादेवकें जखन पता लागल तँ ओहो ओतय पहुँचि गेलाह। हुनका क्रोधमे देखि देवता सब कल जोड़ि क्षमाप्रार्थी भेलाह। ओ सब कहलथिन जे अहाँ कें अपमानित करबाक दण्ड दक्ष पाबि गेलाह। आब यदि यज्ञ सम्पन्न नहि होयत तँ संसारक अनिष्ट भए जाएत आ बिना यजमानक जौने यज्ञ कोना होयत। तैँ हेतु आब कहुना हुनका जियाउ।

अन्तमे औढरदानी महादेव पसीझ गेलाह, आ यज्ञमे बान्हल बकरीक मूड़ी काटि दक्षक धड़ पर बैसा देलनि। ओ पुनः जीवित भए “बो-बो” करए लगलाह। महादेवकें हुनकर नव बोली बड़ प्रिय लागल। तहियेसँ लोक महादेवक पूजाक अन्तमे बो-बो वू करैत अछि।

दक्ष यज्ञ समाप्त भेल किन्तु महादेव बताह भए गेलाह। ओ सतीक शवकेँ अपन कान्ह पर लेने जतए ततय बौआए लगलाह। विष्णु भगवानकें ई स्थिति जखन नहि सहल भेलनि तखन ओ अपन चक्रसँ सतीक शवकेँ काटि काटि खसबय लगलाह। सतीक अंग सब जतए जतए भूमि पर खसल से सब सिद्धपीठ भए गेल। विष्णु महादेवकें परामर्श देलथिन जे ओ कठिन तपस्या करथु, सती जखन पुनः जन्म लेतीह तखन ओ हुनका प्राप्त भए जेथिन। महादेव तखन कैलाश छोड़ि हिमालयक घनघोर जंगलमे जाए तपस्यामे लीन भए गेलाह।

पतिव्रताक कथा

एकटा राजाकें दू कन्या छलथिन, पहिल कुमरब्रता आ दोसर पतिव्रता। कुमरब्रताक अर्थ जे भरि जीवन कुमारि रहथि आ पतिव्रताक अर्थ जे अपन पतििए के सर्वस्व बूझि तथा जीवन भरि हुनक सेवामे लीन रहथि, पतिएक आज्ञानुसार सब कार्य करथि। राजा पतिव्रताक विवाह एक राजकुमारसँ कराए हुनका सासुर पठाय देलनि। कुमरब्रताकें नन्दन वनमे एक कुटी बनाए हुनका रहबाक व्यवस्था कए देलनि। एक दिन एक सिद्ध योगी ओहि वन देने जाइत छलाह। एक कौआ हुनका माथ पर चटक कए देलकनि। योगी क्रोधसँ कौआ केँ सराप दए देलनि। कौआ जरि कए भस्क भ गेल। साधु भीख मँगैत-मँगैत पतिव्रताक ओताए पहुँचलाह। पतिव्रताक कहलथिन-नन्दनवनमे आगि लागि गेल छैक। ओहि वनमे हमर बहिनक कुटी छनि। ओकरा बचा कए आउ, ताबत हम तुलसीकें बेढ़ दैत छी, तखन भीख देब। साधु हुनका डेरेलथिन, हमरा जँ शीघ्र भिक्षा नहि देब तँ श्राप दए देब। ताहि पर पतिव्रता कहलथिन-“हम कौआ नहि छी जे अहाँक सराप सँ भस्म भए जाएब।” ई सुनि साधु अवाक भए गेलाह जे ई स्त्री तैँ हमरो सँ बेसी सिद्ध अछि। बाबाजी तुरंत नन्दनवन गेलाह। ओताए ओ देखलनि जे समस्त वनमे आगि लागल छैक। खाली कुमरब्रताक कुटी पतिव्रताक प्रभुत्व सँ बांचल छैक। बाबाजी तखन कुमरब्रता सँ कहलथिन-“अहाँ भरि जन्म कुमारि रहिकें तपस्या केलहुँ किन्तु अपन कुटीकें नहि बचा सकलहुँ। अहाँक कुटी पतिव्रताक प्रभाव सँ बांचल। तैँ ई सिद्ध भेल जे कुमरब्रतासँ पतिव्रता पैघ होइत अछि।

ई सुनि कुमरब्रता निश्चय केलनि जे ओहो विवाह कए पतिव्रता बनि जेतीह। भोर भेला पर जाहि पुरुषक दर्शन हुनका सब सँ पहिने होयतनि तनिके सँ विवाह कए लेतीह। भोर भेला पर हुनक प्रथम नजरि एक कुष्ट रोगी पर पड़ल। ओकर शरीर कुष्ठ सँ गलल जाइत छलैक। तैओ ओ निश्चयकु अनुसार ओकरहि अपन स्वामी बना लेलनि। ओकरा अपन कुटीमे आनि ओकर सेवा करए लगलीह। दिन राति स्वामीक सेवा करथि, किन्तु स्वामीक रोग बढ़ले जाइन। अन्तमे एक दिन हुनकर पति कहि देलनि जे आब हम बेशी दिन नहि जीब। तैँ हमरा तीर्थ कराए दिअऽ। ओ अपन पतिकें डाकीमे लए माथ पर उठाए बिदा भेलीह। रास्तमे एकटा ऋषि सूली पर लटकल तपस्या करैत छलाह। पतिव्रता जखन अपन माथ परसँ ढाकी उतारे लगलीह तऽ ऋषिकें डाँड़मे चोट लागि गेलनि। हुनक समस्त शरीर कनकनाए लागल। ऋषि हुनका श्राप दए देलथिन-“जाहि स्वामी लए तोँ ऋषिकें एतेक कष्ट पहुँचलैह से स्वामी सूर्योदय सँ पहिनहि मरि जेथून।” ई सुनि हुनका बहुत दु:ष भेलनि आ' ओ ओही ठाम बैसि कए भगवान सूर्यक व्रत करए लगलीह। ओ पहिनहु ततबा तपस्या केने छलीह जे हुनका विधवा होएब असम्भव छल। महात्माक श्रापसँ पति मरि तैँ गेलथिन किन्तु सतीक तपस्याक प्रभाव सँ ओ फेर जीवि उठलथिन आओर हुनक शरीर पूर्ण स्वस्थ भए गेल।

एहि तरहँ सतीक कतेको महिमा देखल गेल अछि। तैँ हेतु सती-सीता, सावित्री, अनसूया, बिहुला आदिक गुण-गान एखनहु धरि होइत अछि। यदि कोनो स्त्री मनसँ अपन पतिक सेवा करैत छथि, तँ हुनका कोनो प्रकारक क्लेश नहि होइत अछि। ओ सती-सीता सावित्री जेकाँ अमर बनि जाइत छथि।

पाँचम दिनक कथा

दंत कथा पर आधारित महादेवक परिवारक कथा

दक्षक यज्ञमे सतीकें प्राण त्यागलाक बाद दक्ष प्रजापति हिमालय रूपमे अवतार लेलनि। हुनका क्रमशः पाँच कन्या भेलथिन उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आ सन्ध्या। एहि पाँचो कन्याक विवाह बेरा-बेरी महादेव सँ भेलनि।

उमा

हिमालयक पत्नी मनाइनक पहिल पुत्री जखन पाँचे वर्षक भेलीह तखनहि महादेवकें वर रूपें प्राप्त करबाक कामनासँ तपस्या करबाक हेतु बन बिदा भेलीह। माए मनाइन हुनको उमा कहिकें मना केलन्धि तथापि ओ चले गेलीह। तैँ हुनकर नाम उमा पड़ल। आठ वर्षक भेला पर महादेव हुनक तपस्या सँ प्रसन्न भ' हुनका सैं विवाह कए लेल। ई समाचार सुनि मनाइन बताहि जेकों करए लगली जे फूल सनक बेटीकें बुढ़वा वर लए गेल।

पार्वती

हिमालयकें दोसर बेटी पार्वती भेलथिन। हुनका बाढ़ि उमे जकाँ छल। ओहो थोड़े दिनमे विवाहक योग्य भ' गेलीह। पार्वती एक दिन फूल तोड़ए लेल सखी सभक संग कनक शिखर पर गेलीह। ओताए ओ एक गोट बूढ़ व्यक्तिकें देखल जकरा बड़का-बड़का पाकल केश, बड़का-बड़का दाँत छल। ओ बसहा पर चढ़ल डमरू बजबैत छल। पार्वती चिन्हि गेलीह जे ओ आन केओ नहि, साक्षात महादेव छथि। पार्वती सखी सबमक मनो केला पर ओकरा सबकें घर बिदाकए अपने महादेव संग बसहा पर चढ़ि चल गेलीह। सखी सब घर आबि मनाइनकें सब बात कहलनि। ओ अपन कपार झौंटय लगलीह जे हमरा कपारमे की लिखल अछि, जे एना भ' जाइत अछि किन्तु आब जे भ' गेल तकर कोन उपाय।

गंगा

हिमालयकें तेसर बेटी भेलथिन गंगा। ओहो जखन पैघ भेलखिन तखन एक दिन महादेव भिखारिक रूपमे आबि गंगाकें अपन जठामे नुकाए भागि गेलाह। मनाइन जखन ई बुझलनि तखन फेर माथ कपार झौंटय लगलीह; जे ई बुढ़बाक यह धंधा छैक जे हमर बेटी सबकें चोरा कए लए जाइत अछि। तहियासँ गंगा सतत महादेवक जटामे रहए लगलीह।

छठम दिनक कथा

गंगाक कथा

सगर महाराजके दू स्त्री छलथिन, वैदर्भी आ शैव्या। शैव्या सैं असमंजस नामक पुत्र भेलनि। वैदर्भीके सन्तान नहि छलनि। ओ संतानक निमित्त महादेवकर तपस्या करए लगलीह। सए वर्षक बाद एक गोट लोथक जन्म भेल ई देखि वैदर्भी कानए लगलीह। महादेवक स्मरण कएल। महादेव ब्रह्मणक रूप धारण क' ओताए अएलाह, आ ओहि लोथकें साठि हजार खण्ड क' प्रत्येककें एक-एक तौलामे तेल द' झौंपिकें राखि देलनि। थोड़ेक दिनक बाद साठियो हजार लोथक खण्ड साठि हजार सुन्दर आ बलवान पुत्रक रूपमे प्रकट भए गेल।

सगर महाराज निन्यानबै टा अश्वमेध यज्ञ पूरा कए सएम यज्ञ करबाक तैयारीमे लागल छलाह। किन्तु इन्द्र नहि चाहैत छलाह जेँ हुनकर यज्ञ पूर्ण हुआए, कारण सए गोट अश्वमेध यज्ञ क' लेला पर ओ व्यक्ति शतक्रतु इन्द्र भए जाइत अछि। तैँ ओ कोनो ने कोनो विघ्न उपस्थित क' दैत छलथिन।

अश्वमेधक घोड़ा छोड़ल गेल, जकर रखबार राजा सगरक ओएह साठिओ हजार पुत्र भेलाह। इन्द्र अपन छल बलसँ घोड़ा लए भागि गेलाह। सगरक साठियो हजार पुत्र इन्द्रकेँ खिहारलकनि। ओ लोकनि घोड़ाकेँ तकबाक हेतु पृथ्वीके कोड़ैत आगू बढ़ैत गेलाह। अन्तमे घोड़ाकेँ कपिल मुनिक आश्रममे बान्धल देखलनि। कपिल मुनि तपस्यामे लीन छलाह। सगरक बेटा सब हुनकहि चोर बुझि दौड़ल। मुनिक ध्यान भग्न भए गेल। हुनकर क्रुद्ध दृष्टिसैं साठियो हजार राजकुमार तत्क्षण जरिकें भस्म भए गेलाह। राजाक यज्ञ अपूर्ण रहि गेल। सगर महाराज शोकाकुल भए मरि गेलाह।

राजकुमार लोकनिक अपमृत्यु भेल छल। हुनका लोकनिक सद्गतिक उपाय पर विचार करबाक हेतु ज्ञानी लोकनिक सभा बैसल। सभा एहि निष्कर्ष पर पहुँचल जे यदि गंगा बैकुण्ठसँ पृथ्वी पर आबथि आ हुनका लोकनिक छाउरकें डुबा क' पवित्र करथि तखनहि राजकुमार लोकनिकें सद्गति प्राप्त भ' सकैत छनि। एहि लेल हुनकर वैमात्रेय भाय असमंजस तपस्या करैत-करैत मरि गेलाह। हुनकर बेटा दिलीप सेहो लाख वर्ष धरि तपस्या कएलाक उपरान्त मरि गेलाह। दिलीपक बेटा अंशुमन सेहो तपस्या करैत मुइलाह। तखन हुनक बेटा भगीरथ तपस्या करए लगलाह। हुनकर तपस्या सैं विष्णु प्रसन्न भए हुनका गंगाकें बैकुण्ठसँ मृत्युलोक अनबाक अनुमति दए देलथिन।

गंगाकें एकाएक पृथ्वी पर उतरि गेलासैं पृथ्वी रसातलमे धँसि जैतथि तैँ हेतु महादेव हिमालयक ऊँच चोटी पर चढ़ि हुनका माथ पर उतारि जटामे समेटि लेलनि। हुनकर जटासैं निकलि गंगा हिमालय प्रदेशकें दहबैत विदा भेलीह। जखन जह्नु ऋषिक आश्रम दहाए लागल त' ओ गंगाकेँ पीबि गेलाह। ई भगीरथ लेल जटिल समस्या उपस्थित कए देलक। ओ साहसी छलाह। ओ मुनिक सेवामे लागि गेलाह। अन्तमे मुनि एहि शर्त पर गंगाकेँ छोड़ल जे गङ्गा हुनकर बेटी कहाबथि। तहियासँ गङ्गा जाह्नवी कहाबए लगलीह। गङ्गाद्वार होइत हरिद्वार अएलीह। भगीरथ हुनका आगू-आगू ओम्हर गेलाह जेम्हर हुनकर पितरक छाउर छलनि। गङ्गा सबकें दहबैत-डुबबैत भगीरथक सगरक साठि हजार पुत्र अश्वमेधक घोड़ा तकबामे खुनने छलाह। तैं आब ओ सागर कहबैत अछि। एहि तरहँ गङ्गा मर्त्यलोकमे आबि सगरक साठि हजार बेटाकें सद्गति देल तथा भगीरथक परिश्रमकें सफल बनाओल।

गौरीक जन्म

सतीक मृत्युक बाद महादेव संसार सैं विरक्त भए कोनो निर्जन स्थानमे तपस्यामे लीन भए गेलाह। हुनका संसारक कोनो सुधि नहि रहि गेल। एहि बीच राक्षस सभक उपद्रव बहुत बढ़ि गेल। ओहिमे ताड़कासुर परम पराक्रमी भेल ओ तपस्याक बल पर ब्रह्माकें प्रसन्न कए वरदान मङलक जे हम अमर रहो। ब्रह्मा कहलनि जे ई असम्भव अछि; जे जन्म लेलक तकर मरण अनिवार्य छैक। तखन ओ दोसर वरदान मङलक जे हमर मृत्यु महादेवक औरस पुत्रक हाथे हुआए। ब्रह्मा तथास्तु कहि देल।

ई वरदान मङबामे ताड़कासुरक ई उद्देश्य छल जे महादेवक स्त्री निःसन्तान मरि गेल छलथिन आ' महादेव संसारसँ विरक्त भए गेल छथि। हुनक दोसर विवाहक कोनो सम्भावना नहि छल। तैं हेतु हुनक पुत्रक हाथैँ ताड़कासुरकेँ मरबाक कोनो प्रश्न नहि छल। अर्थात् ओ अमर रहि जैत।

ताड़कासुर देवता लोकनिकें स्वर्गसँ भगा देलक आ सबहक राजा बनि गेल। यज्ञ-जाप बन्द कए देलक। मुनि सबकें सतबए लागल। सुन्दरि स्त्री सबकें अपहरण करए लागल। समस्त संसारमे कोलाहल मचि गेल।

ओकर उत्पातसैं तंग आबिकें देवता आ ऋषिगण सब ब्रह्माक ओतय उपस्थित भेलाह। ब्रह्मा हुनकर सबक बात सुनिकें कहलथिन जखन-जखन संसारमे दैत्य दानव सब एहि तरहक उपद्रव मचौलक अछि, तखन-तखन आदि शक्ति महामाया दुर्गा अवतार लए ओकरा सबक संहार कयलनि अछि। अहाँ लोकनि जाहि महासंकटमे छी ताहि उद्धारक लेल हुनकेँ आराधना करू, ओएह सतीक रूपमे जन्म लए महादेवसँ विवाह कएने छलीह। ओ पुनः गौरीक रूपमे जन्म लेतीह आ महादेवसँ हुनक विवाह हेतनि। हुनका जे बेटा हेतनि सएह ताड़कासुरक बध करताह। से सुनि देवता ओ ऋषि-मुनि दुर्गाक आराधनामे लागि गेलाह।

किच्छु दिन बाद हिमालयकें एक बेटी भेलनि। ई देखि देवतागण हर्षसँ फूलक वर्षा केलनि। ओ अत्यन्त गोरि रहथि तैँ हेतु हुनकर नाम गौड़ी पड़ल।

काम-दहन

हिमालय ओताए एक दिन नारद मुनि एलाह। हिमालय हुनका गौरीकें देखाए पुछलनि जे हिनक विवाह ककरा संग होएतनि। नारद मुनि गौरीक हाथ देखि कहलनि जे हिनकर विवाह महादेव संग होयतनि। से ओहिना नहि हेतनि। महादेव एखन अहींक शिखर पर तपस्या कए रहल छथि। ई नित्य ओतय जाय हुनकर सेवा करथि। तखन ओ प्रसन्न भए हिनकासैं विवाह कए लेथिन।

गौरी चेष्टगरि भए गेलीह। हिमालय हुनका नित्य दू गोट सखी संग महादेवकर सेवा करए पठबए लगलथिन। देवतागण महादेवक तपस्या भग्न कए गौरीक दिश हुनकर ध्यान आकृष्ट करैतबाक हेतु तपोवनमे कामदेवकेँ पठाओल। कामदेव अपन मित्र वसन्त आ स्त्री रतिक संग ओतय पहुँचि गेलाह। वसन्तक महिमासँ समस्त बनक गाछ सब फुलाए गेल। सुगन्धिसँ वन प्रान्त गमकि उठल। फूल सब पर भमरा मड़राए लागल। शीतल समीर बहए लागल। चन्द्रमाक ज्योतिसँ वन सुन्दर लागए लागल। एहि रमणीय वातावरणमे मुनिक तऽ कोन कथा जे महादेवक तपस्या भंग होमए लागल। गौरी सजि-धजिकें वासन्ती फूलक गहना पहिरि सखीक संग ओहि वनमे पूजा करबाक लेल पहुँचलीह। गौरी परम सुन्दरी छलीह। ताहि पर ओहि दिनक साज शृंगार आ फूलक सजावट सैं हुनकर अंग-अंग सौन्दर्य निखरि गेल। गौरी महादेव लग पहुँचलीह कि कामदेव ठिका कय अपन वाण चलाओल। वाण महादेव लग खसल। महादेव गौरी दिश तकलनि। गौरी महादेवकें प्रणाम कए पूजा कएल आ कात भए ठाढ़ भए गेलीह। गौरीक सुन्दरता देखि महादेव आकर्षित भए गेलाह। आजुक अहाँक शोभाक वर्णन के कए सकैत अछि, एतबा कहि महादेव गौरीक आँचर दिश हाथ बढ़ाओल स्त्री महज संकोचवश गौरी कनेक दूर हटि महादेव दिश टकटकी लगा देलनि। महादेवकें एकाएक ध्यानमे आयल यदि वैह एना कामातुर भए जेताह तँ आन की करत। ओ एम्हर-ओम्हर ताकए लगलाह तँ झाड़ीमे नुकाएल कामदेवकेँ देखलनि। हुनका बड़ तामस भेलनि। क्रोधसँ हुनक त्रिनेत्र खुजि गेलनि। कामदेव जरि कय भस्म भय गेलाह।

रति अपन स्वामीकेँ भस्म होइत देखि मूर्च्छित भ' गेलीह। होस भेला पर ओ करुणा विलाप करय लगलीह। देवता लोकनि रतिक दशा देखि महादेव ओतय गेलाह आ कहलथिन जे एहिमे कामदेवक कोनो दोष नहि छलनि। ई हुनके सबक प्रपंच छल जे महादेव कहुना गौरी दिश आकृष्ट भए हुनकासैं विवाह करथि। तखने ताड़कासुरसैं हुनका सबक उद्धार भ' सकैत छल। महादेव कहुना रतिक स्वामीकें जीबाक उपाय कए देथून।

महादेव कहलथिन-कामदेव मुइला नहि, मात्र हुनकर शरीर जरलनि अछि। हुनका एखन ओ शरीर प्राप्त नहि हंतनि। समुद्रमे शम्बर नामक दैत्य अछि। रति ओताए जाए एखन ओकरे संग रहथु। द्वापरमे श्रीकृष्णक बेटा प्रद्युम्न भए जन्म लेताह। जनमिते शम्बर हुनका उठा कए अपन नगर लए जायत। रतिकें ओतहि प्रद्युम्नक रूपमे कामदेव भेटथिन। जखन ओ पैघ होएताह तखन शम्बरकैँ मारि ओकर धन-सम्पत्ति सहित रतिकें द्वारिका लए जेथिन आ रतिसैं विवाह कए सुख विलास करताह।

ई बात देवता लोकनकेँ कहि महादेव अन्तर्ध्यान भए गेलाह। रति शम्बरक ओताए आश्रय लेबाक हेतु विदा भेलीह आ कामदेवसँ पुनर्मीलनक प्रतिक्षा करए लगलीह।

सातम दिनक कथा

गौरीक तपस्या

गौरी कामदहन आ महादेवक व्यवहार देखि डेरा गेलीह। हुनका कतहु चैन नहि भेटनि। सदैव शिव-शिव रटैत रहथि। एहि बीच हुनका नारद मुनिसँ भेंट भेल। ओ महादेवकें प्राप्त करबाक उपाय पूछल। नारद कहलथिन-बिना तपस्याक महादेवक दर्शन भेनाइ कठिन अछि। हुनका केवल तपस्यासँ प्राप्त कए सकैत छी।

तखन सखी सब महारानी मनाकें सब बात कहलथिन। मैना गौरीकें बजाकें कहलथिन-अपनहि घरमे सब देवता छथि। एहन सुकुमारि शरीरसँ वनमे तपस्या केलासँ बड़ कष्ट होयत। तैँ हेतु हमर विचार जे घरहिमे तपस्या करू। मुदा गौरीकें ई बात नहि जँचल। बिना महादेवक तपस्ये हुनका चैन नहि भेटैत छल। गौरीकें दुखी देखि माए बहुत चिन्तित भेलीह। अन्तमे जंगल जाए तपस्या करबाक आज्ञा दए देलनि।

गौरी माय बापकें प्रणाम कए सखी सबक संग वन बिदा भेलीह। ओ पटोर आ गहना खोलि कृष्णाजिन आ बल्कल पहिरि लेलनि आ गौरीशिखर नामक चोटी पर गेलीह। फल-फूलसँ लदल मनोरम स्थानकें देखि ओ ओकरा साफ कए तपस्याक बेदी बनाओल। ओहि पर बैसि ओ कठिन तपस्या आरम्भ कयलनि। गर्मी मासमे चारू कात धुनि लगा कए सूर्यक दिस तपस्या करथि। बरसातमे बिना अढ़वला स्थानमे तप करथि आ जाड़ मासमे जलमे ठाढ़ भय तपस्या करथि।

जे तपस्या मुनिगणसँ पार नहि लागल से तपस्या एकटा सुकुमारि कन्याकें करैत देखि मुनि लोकनि हुनक दर्शन करए आबए लगलाह। सब हुनक प्रशंसा करए लगलाह। ओहि आश्रमक अद्भुत हाल छल। ओताए गाय-सिंह एकहि घाटमे पानि पिवैत छल। गौरीक तपस्याक प्रतापसँ कैलाश ओ गौरी-शिखरमे कोनो अन्तर नहि रहल।

गौरीसैं प्रभावित भ' ऋषि-मुनि सब नारदक संग महादेवक ओताए गेलाह। हुनका सब विनम्र भ' कहलनि-“हे महादेव, गौरी तैँ एहन तपस्या क' रहल छथि जेहन आइ तक ने कियो कयलक आ ने आगू कियो क' सकत। आबहु अपने हुनका पर प्रसन्न भ' हमरा लोकनिक काज करियौक।

महादेव कहल-गौरी अपन तपस्या सैं हमरा प्रसन्न क' देलनि। आब हुनकर मनोरथक पूर्ति हम करब। अहाँ लोकनि जाइत जाउ। आहाँ सबक काज अनायासे भ' जायत।

महादेव बूढ़ बाबाजीक रूप धए गौरीक तपस्याक स्थान पर गेलाह। बाबाजीक रूपकें देखि गौरी हुनक स्वागत सत्कार कएलनि। बाबाजी प्रसन्न भ' हुनका पुछलनि जे कोनो तरहक विघ्न-बाधा तऽ नहि अछि। इहो पुछलनि जे कोन कामनासैं एतेक पैघ तपस्या करैत छी।

गौरी अपने किछु उत्तर नहि दए अपन सखीकें इशारा केलनि। ओ कहलथिन जे हमर सखी महादेबसँ विवाह करबाक कामनासँ तपस्या कए रहि छथि। जहिये ई तपस्या शुरू केलनि तहिये आश्रममे फल-फूल लगौलनि। ओ सब गाछ बढ़ियाँ फल-फूल दए रहल अछि, लेकिन हिनकर कामनाक फलक एखन अँकुरो नहि फूटल अछि।

बाबाजी गौरीसँ पूछल-की ई बात सत्य कहैत छथि ?

गौरी उत्तर देलथिन-हैं, ई सत्य कहैत छथि।

ताहि पर बाबाजी अपन निराशा प्रकट करैत विदा भेलाह जे हुनका होइत छलनि जे गौरी कोनो पैघ कामनासँ एहन कठिन साधनामे लागल छथि।

गौरी हुनका जाइत देखि रोकबाक प्रयास करैत पुछलनि जे हमरासँ कोन अपराध भेल जे एना निराश भ' तमसाएल जाइत छी।

बाबाजी बजलाह, “अहाँ हमर अपराध नहि कए, अपन हानि कए रहलहूँ अछि। हमरो पहिने अहाँ पर श्रद्धा भ' गेल छल, मुदा अहाँक अभीष्ट बूझि घृणा भए गेल। अहाँ अशर्फी बेचि माटि कीनए चाहैत छी। हाथीक सवारी छोड़ि बरद पर चढ़ए चाहैत छी। सूर्यक प्रकाश छोड़ि भगजोनीक इजोतमे रहए चाहैत छी। कोठा-सोफा त्यागि मरघटमे दिन बिताबए चाहैत छी। कतए सर्वसम्पन्न इन्द्रादि देवता आ' कतए भिखमंगा महादेव ? आहाँ सन सुकुमारि आ' परम सुन्दरिकें ओहि बूढ़ भिखमंगा महादेव ? जोड़ी केहन लागत ? आहाँ एहन चन्द्रमा सन मुँह आ महादेवक दाढ़ी मोछ वला मुँह, अहाँक कमल सन आँखि आ' हुनका तीन टा आँखि, अहाँक माथमे फूलक बेनी आ हुनक माथ आ देहमे छाउर। अहाँक शरीरमे सोनाक गहना आ हुनका शरीरमे साँप लपेटल आ गर्दनिमे मुण्डक माला। अहाँ मंगलमयी आ' ओ महाअमंगल। अहाँ महाराज हिमालयक बेटी आ ओ ककर सन्तान छथि से ओहो नहि जनैत छथि। धनिक तेहन छथि जे देह पर लत्ता मात्र नदारद। कन्या लेल लोक वरमे जे-जे गुण तकैत अछि ताहिमे एकोटा गुण महादेवमे नहि छनि। हुनकासँ विवाह कएलासँ अहाँक कोनो मनोरथ पुरत ? अहाँ पर महादेवकें जँ कनिओ अनुराग रहितनि तँ ओ कामदेवकें नहि जरैबतथि। ओ अहाँक योग्य वर कदापि नहि छथि।”

महादेव निर्गुण ब्रह्मा थिकाह। ओ अपन इच्छानुसार सगुण सेहो होइत छथि। ओएह ब्रह्माक रूप धए संसारक सृष्टि करैत छथि। सबहक आदि पुरुष ओएह थिकाह। हुनकर बाप पुरुष के भए सकैत छथि ? सब विद्याक आदि ओएह छथि। हुनके श्वाससँ वेद बहराएल अछि। तखन ओ मूर्ख कोना भ' सकैत छथि ? कोनो गरीब लोक मनसँ हुनकर पूजा करैत अछि तँ ओ अत्यन्त धनिक भ' जाइत अछि। हुनकर लीला अपरम्पार छनि। सुन्दरसँ सुन्दर आ कुरूपसँ कुरूप हुनके रूप छनि। ओ कहियो अमंगलकारी नहि भए सकैत छथि। अहाँ अपने पापी छी, तैँ अहाँ हुनकर रहस्य कोना बुझबनि। अहाँक हम सत्कार कएल, अहाँसँ गप्प कएल एकर हमरा प्रायश्चित करए पड़त।”

बाबाजी फेर किच्छु बाजए लगलाह, गौरी अपन सखीसँ बाबाजीकें हटाए देबय कहलथिन। ओ कहलथिन जे फेर ई महादेवक निन्दा करताह। पैघक निन्दा केलासैं करयबलाके सिर्फ पाप नहि होइत अछि वरन् सुननिहारोकें सेहो होइत छैक। ई कहि गौरी ओताएसँ तमसा क' विदा भए गेलीह। बाबाजी तुरत महादेवक रूप धए ठाढ़ भए गौरीक बाट रोकि देल आ कहल “हम अहाँक तपस्यासँ प्रसन्न छी। जे वरदान माँगब से माँगू। आइसँ हम अहाँक कीनल दास छी।”

गौरी लाज ओ आनन्दसँ काठ भए गेलीह। महादेव कहल, “आब अहाँक वियोग हमरा सहल नहि जाइत अछि। कैलाश चलू, ओतहि विवाह करब।”

गौरी लाजेँ महादेवकें किच्छु नहि कहि सकलीह। ओ अपन सखी द्वारा कहबौलनि, यदि अहाँ हिनका पर प्रसन्न छियनि तँ अहाँ हिनकर एतवा अनुरोध मानि लियौन। एखन हिनका बापक घर जेबाक अनुमति दियौन। अहाँ कोनो पैघ लोककें हिनकर पिताक ओताए पठा क' हिनका संग विवाहक प्रस्ताव करियौन। विवाहक जे प्रचलित नियम अछि ताहि अनुसारे विवाह हो, जाहिसँ हिनक पिताक गृहस्थाश्रम सफल होनि आ यश पसरनि।

गौरीक बात मानि महादेव अन्तर्ध्यान भए गेलाह। गौरी अपन बापक घर अयलीह। हिमालय आ मैना गौरीक सखीक मुँहें सब बात सुनि प्रसन्न भेलीह। ऋषि-मुनि समाचार पविर्ताह हिमालयक ओताए एलाह।

आठम दिनक कथा

गौरीक विवाहक वर-वरियाती

महादेव काशीमे सप्तर्षिकें बजाओल। ओ लोकनि तुरत आबि गेलाह। वशिष्ठक संग हुनक स्त्री अरुन्धती सेहो अयलीह। महादेव सबकें विवाहक कथा लए हिमालयक ओताए पठौलनि। महादेवक अनुरोध ऋषि लोकनिसँ सुनि हिमालय आ मैनाक आँखिसँ नोर झरए लगलनि। ऋषि-मुनि गौरीकें आशीर्वाद देल। अरुन्धती मैनाकेँ महादेवक महिमाक गुण-गान सुनाओल। कथा स्थिर भेला पर विवाहक दिन ताकल गेल। विवाहक दिन फागुन वदि चतुर्दशी ताकल गेल। सप्तर्षि लोकनि प्रसन्न भए काशी घुरि अयलाह आ' महादेवकें सब बात कहलनि। महादेव प्रसन्न भए हुनका लोकनिकें बरियाती चलबाक हकार देल। महादेव कैलाश अयलाह। देवता लोकनिकें निमन्त्रण आ' हकार देबाक भार नारद मुनिकें देल गेल। महादेवक गण सब बरियातीक तैयारी करए लागल। वरकें सजाएल जाय लागल हुनका गहना की देल जेतनि ? जएह सब हिनक गहना छलनि तकरे सजाओल गेलनि। माथ पर चन्द्रमाक मुकुट, शरीरमे साँपक गहना। जटाकें झारि कए नीक जकाँ बान्धि देल गेलनि। नवका बाघम्बर ओढ़ाओल गेलनि। किन्तु एतबे शृंगारमे महादेव परम सुन्दर लागय लगलाह।

चारिम दिन महादेवकर बरियाती हिमालयक ओतय पहुँचल। हिमालय अपन कुटुम्बक संग बरियाती लोकनिक सत्कारमे लागि गेलाह। मैनाकें बड़ मोन लागल छलनि जे जाहि वर लेल गौरी एतेक कष्ट सहलनि अछि से वर केहन छैक। ओ नारद मुनिकें संग लए दुआरि पर वर देखबाक लेल गेलीह।

सबसँ पहिने गन्धर्वराज अएलाह हुनकर सुन्दरता देखि मैनाकेँ भेलनि जे इएह वर छथि, ओ प्रसन्न भेलीह नारद कहलथिन जे ई तऽ देवताक गबैया थिकाह। तकर बाद धर्मराज अयलाह। मैनाकें भेलनि इएह वर छथि, मुदा नारद फेर कहलनि जे ई तऽ धर्मराज छथि। महादेव तऽ हिनका लोकनिसँ कतेक सुन्दर छथि। एहिना क्रमशः सुन्दर देवता लोकनि अबैत गेलाह मैना सबकें पहिने वरे बूझथि। नारद सबहक परिचय हुनका दैत गेलथिन। मैना गौरीक भाग्य पर गर्व करए लगलीह। महादेव ई बात बूझि गेलाह। ओ किच्छु तमासा करए चाहलनि। आब नारद कहल-“ओएह वर आबि रहल छथि। हुनका देखि अपन आँखि जुड़ाउ।”

मैना सावधान भए हुलसि कए देखए लगलीह। पहिने महादेवक सेवक भूत, प्रेत, पिशाच सब आएल। ओकरा सबहक पोशाक, बाजब-भूकब, नाचब-गायब देखि मैना डेरा गेलीह। जी धक्-धक् करए लगलनि। एहने ने वर होधि। तावत् महादेव सेहो अयलाह। बसहा पर चढ़ल, पाँच मुँह, तीन आँखि, दश गोट हाथ, शरीरमे छाउर लेपने, कौड़ीक माला पहिरने, माथ पर चन्द्रमा, एक हाथमे खप्पर, दोसरमे भिक्षापात्र, तेसरमे पिनाक, चारिममे तीर, पाँचममे त्रिशूल, छठममे अभय। अही तरहँ सब हाथमे किछु ने किछु भरल हाथीक चाम पहिरने, ऊपरसँ बाघम्बर ओढ़ने, साँसे शरीर साँप लटकल, आँखि मुनने आ थर-थर काँपैत।

नारद कहलनि इएह वर (महादेव) थिकाह। ई देखैत मैना बेहोश भए गेलीह। मैना कहि उठलीह-जिद्दी छौंडी। की कयलें ? एहन वरक संगा कोना रहबें ?

नवम दिनक कथा

मैनाक मोह भंग

गौरीक वर महादेवकें देखि मैना बेहोश भए गेल छलीह। लोक कोनो तरहँ हुनका होशमे अनलक। होश भेला पर नारद आ गौरीकें फज्झति करय लगलीह। ओ नारदसँ कहलनि-“नारद ! तोँ महा ठक्क छह। तोँ पहिने कहने छलें जे महादेव गौरीकें चाहैत छथि। फेर कहलें जे गौरी हुनकर सेवा करथु आ' कठिन तपस्या करथु तखन महादेवक संग विवाह हेतनि। एहिमे जे हमर बेटीक अपमान भेल से संसार जनलक। हम कतहु मुँह देखयबाक योग्य नहि रहलहूँ। हम कतय जाउ, की करू, किच्छु नहि फूरैत अछि। हम जिवितहि मरि गेलहूँ। हमर घर चौपट भए गेल। अनकर की भेलैक ? हमर मनक सब मनोरथ मनहि रहि गेल, कहाँ गेल ओ सप्तर्षि आ ओ स्त्री। एखन यदि ओ सब भेटैत सबहक मोँक्ष-दाड़ी नोचि लितियैक। ओ स्त्री तऽ और ठक्किन निकलल।” गौरी सैं कहल-“हम अनका की कहियौक, हमर तऽ अपने घर बिगड़ल अछि। सब नाच तऽ हमर बेटीक कारण भेल। ओ तऽ सोना बेचि मािट किनलक आ सूर्यक प्रकाश छोड़ि भगजोगनीमे रहय लागल। एहन सुन्दर शक्तिशाली देवता सबकें छोड़ि महादेवकर तपस्या कयलक। गय गौरी, तोरा आ तोहर तपस्याकेँ धिक्कार छौक। घर आ सींसे नगरकें डाहि दे। अपनहि विष खा कय किएक नहि मरि गेलैं। कहाँ गेल ई छौंडी। आ, आइ हम तोहर गरदनि काटि दियौक।”

ई सब कहि मैना कतहु आराम करय हेतु गेलीह। हिमालय कतबो कहलथिन ओ किच्छु नहि उत्तर देथि। ब्रह्मा सब बात बूझि मैनाकें बुझाबय अयलाह। ओ मैना सँ कहलनि-“महादेव सब देवता सैं पैघ छथि। ओ परमेश्वर छथि। ओएह संसारक पालन तथा संहार करैत छथि। अहाँ हुनका एखन तक नहि चिन्हालियनि अछि तैँ बताहि जकाँ करैत छी।”

मैना तुरत उत्तर देलथिन-“आर जे कहब से कहू, मुदा ई जुनि कहू जे महादेवक संग गौरीक विवाह कए दिऔन। अहाँ लोकनि गौरीक सुन्दरताकेँ बरबाद नहि करियौन। यदि मन होइत अछि तऽ हुनका जान सैं मारि दिऔन।

दशो दिक्पाल (सूर्य, अग्नि, यम, नैऋति, वरुण, ईशान, ब्रह्मा तथा शेषनाग आदि) मिलि कए मैनाकेँ बुझौलखिन, तैयो मैना एके ठाम कहि देलथिन-“किन्तु से अहाँ लोकनि किच्छु कहब किन्तु हम गौरीक विवाह महादेवक संग ओहि कुरूपक संग नहि होमय देब।” सप्तर्षि लोकनि (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा भारद्वाज) सेहो मैनाकें बुझौलखिन “हमरा लोकनि कहियो कोनो अनुचित कार्यमे नहि पड़ैत छी। हमरा लोकनि उचित बूझि एहि विवाहमे घटक भेलहूँ। स्वयं त्रिलोकीनाथ अहाँक घर पर आयल छथि। सबकें हिनकर दर्शन दुर्लभ होइत छैक। हिनका सँ बढ़ि कए कन्यादानक पात्र दोसर एहि संसारमे कियो नहि अछि।” मेना हुनको लोकनिक बात नहि मानल। अपन बेटी के तरुआरिसँ काटि देबा लए तैयार भेलीह किन्तु महादेवसँ विवाह करबा लए तैयार नहि भेलीह।

तखन हिमालय स्वयं मैनाकेँ बुझाबए एलाह आ कहल- “अहाँ एना कियैक करैत छी? दुआरि पर के सब आएल छथि से नहि देखैत छी। एना बताहि जकाँ करैत छी। हम महादेवकें चिन्हैत छिअनि ओ त्रिलोकीनाथ छथि। ओ सब किछु कए सकैत छथि। तैँ हेतु अपन जिद्द छोड़ि विवाह सम्पन्न होमय दियौक।” मैना उत्तर देल- “हमर निश्चय अटल अछि। हम महादेव संग गौरीक विवाह नहि करब। अहाँ यदि बेटीसँ निश्चिन्त होमय चाहैत छी तऽ ओकरा गरदनिमे पाथर बान्धि कए कतहु डुबा दियौक।” आब गौरी माएकें बुझाबए लेल गेलीह आ' कहलनि- “माए! अहाँक मति एना खराब किएक भए गेल अछि? अहाँ सबदिन धर्म-कर्म पर विश्वास करैत आएल छी। अहाँ महादेव केँ एतेक छोट किएक बुझैत छियनि? ई संसारक पालनकर्त्ता थिकाह। सबकक कल्याण इयह करैत छथि। ई सब देवताक देव महादेव थिकाह। देखियौन हिनका संग देवता हिनकर सेवक बनि आएल छथि। अहाँ उठु। होश करू, आ' महादेवक संग हमरा दान कए सुखी होउ। यदि अहाँ ई काज नहि करब तऽ हम आन कोनो देवतासँ विवाह नहि करब। भरि जन्म कुमारि रहि महादेवक तपस्या करैत रहि जाएब। हम हुनका मन-वचन-कर्मसँ वर बना लेने छियनि।”

मैना गौरीक डिठगरि बात सुनि अवाक रहि गेलीह। ओ क्रोधे थर-थर कपैत गौरीकेँ पकड़ि मारए लगलीह। ई देखि नारद मुनि दौड़ि कऽ गौरीकेँ छुड़ाओल। विष्णु भगवान सेहो मैनाकेँ बहुत बुझौलनि। किन्तु, टस-सँ-मस नहि भेलीह। तखन महादेवकें नारद कहलनि- “हे भोलानाथ भक्तवत्सल, आब अपन भाभट समेटू, आ सुन्दर स्वरूप बनाए गौरीकेँ देल वरदानकें पूरा कएल जाय।”

भोलानाथ अपन रूप बदलि देल। नारद मेनाकेँ जा कए कहलनि- “आब वरकें जा कए देखू ओ केहन छथि।” मेना महादेवकें देखि हुनका देखिते रहि गेलीह। सूर्य सन चमकैत सुन्दर आँखि, मोती-मानिकक गहना पहिरने बड़ सुन्दर लगैत छलाह। सूर्य हुनका छत्र ओढ़ौने, चन्द्रमा चामर डोलवैत, आठो सिद्धि नचैत, गङ्गा-यमुना पाछूमे चामर धएने। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा ऋषि-मुनि हुनकर आगू-पाछूमे जय-जयकार करैत। गन्धर्व तथा अप्सरा सब नचैत, गबैत तथा महादेवक गण सब झालि-मृदंग बजबैत झूमैत, नाना प्रकारक गाजा-बाजा बजबैत छल। एहि समयक महादेवक शोभा अवर्णनीय छल।

महादेकवे एहि रूपैँ देखि मेनाकेँ आश्चर्य लागि गेलनि। आब मेनाकें होश भेलनि। मोनेमोन प्रसन्न भेलीह आ अपन बेटी गौरीक तपस्याक फल त्रिलोकीनाथ महादेवकें देखि पहिलुका अपन भाभट पर लजाकए पछताए लगलीह।

गौरीक विवाह

महादेव देवता , ऋषि-मुनिक बरियाती ओ गाजा-बाजाक संग हिमालयक दुआरि पर पहुँचलाह। मैना हुनका लोकनिक परिछन कएलनि। स्त्रीगण सब गीत गबैत मैनाक पाछू लागि गेल। सब महादेवकर रूप देखि मोहित भए कठपुतरी जकाँ ठाढ़ि भए गेल। सब स्त्रीगण गौरीक भाग्यक सराहना केलक। महादेवकर दर्शनसँ अपनाकें धन्य बुझलक।

देवता लोकनि महादेवकर संग नहि छोड़ल, कारण हुनका लोकनिकें शंका छलनि जे महादेव फेर कोनो तमासा ने ठानि देथि। मैना झट वरक परछनि कए चलि गेलीह। हुनको शंका छलनि जे देवता लोकनि किच्छु हँसी-ठट्ठा ने कए देथि।

वरकें मड़बा पर आनल गेल। हिमालय हुनक अर्हणा (पूजा) कएल। अठोंगर कुटल गेल। महादेव कोबरा घरसँ गौरीके हाथ पकड़ि अनलनि। ब्रह्मा सब काजमे तत्पर छलाह। वरकें रेशमी धोती, फूल तथा सोनाक माला पहिराओल गेल। वर-कनियाँकें आमक पल्लव केर कंगन पहिराओल गेल। ऋषि लोकनि गोत्राध्याय पढ़ाओल। हिमालय कन्यादान सम्पन्न कएल। गौरी शंकर वेदी पर गेलाह। अग्निक आवाहन कए हवन कएल गेल। विवाहक सब विधि सम्पन्न कएल गेल। ऋषि लोकनि वर-कनियाकें आशीर्वाद देल। गन्धर्व, अप्सरा लोकनि नाँच-गान कएल। देवता लोकनि कहल- “हे महादेव! अहाँ जगतपिता छी आ' गौरी जगन्माता भेलीह।”

गौरी-शंकर कुलदेवताकें प्रणाम कए, भोजनसँ निवृत्त भए विश्राम करबाक लेल गेलाह। वरियाती लोकनिक सत्कार प्रारम्भ भेल। जहिना विभिन्न तरहक वरियाती आएल छलाह तहिना हिमालय सबहक लेल विभिन्न प्रकारक ओरियाओन केने छलाह। जतए साक्षात अन्नपूर्णाक जन्म भेल छनि ततए कोन वस्तुक कमी भए सकैत अछि। बरियाती लोकनि प्रसन्न भए हिमालयकेँ धन्यवाद दैत विदा भेलाह, आ' कहलनि- “अहाँ धन्य छी हिमालय। आब हमरा लोकनिकें ताड़कासुरसँ त्राण पएबाक बाट खुजल।

हिमालय कर झरने ठाढ़ छलाह। मैना अपन अज्ञानताक लेल देवता ओ ऋषिसँ क्षма माँगल। ओ लोकनि कहलनि- “ई सब लीला त्रिलोकीनाथक छलनि। अहाँक सौभाग्य बढ़ए। आब हमरा लोकनिकें जेबाक आज्ञा देल जाओ।” आगाँ-आगाँ गौरी-शंकर बसहा पर चढ़ल विदा भेलाह। पाछू-पाछू हुनका लोकनिकें अरिआतबाक लेल हिमालय सहित हुनकर परिवार छलनि। किछु दूर तक हिमालय लोकनि गेलाह आ हुनका लोकनिकें जाइत देखि बेटीक बिछोहें भारी मन लए घुरि अपन घर अएलाह।

दशम दिनक कथा

कार्तिकक जन्म

एक समय महादेव गौरीक संग सम्भोग करबाक इच्छासँ निर्जन वनेमे गेलाह। ओतय ओ सुगन्धित झाड़ीमे संभोग करए लगलाह। महादेव संभोगमे एतेक लीन भए गेलाह जे हुनका सब किच्छु विसरि गेलनि। संभोग करैत-करैत बहुत दिन बीति गेल। देवता लोकनिकें एहिसँ चिन्ता होमय लगलनि। ओ लोकनि ब्रह्मा ओतय पहुँचलाह, आ महादेव जाहि रूपैँ संभोगमे लीन छलाह कहि सुनाओल। एहिसँ जे सन्तान हेतनि से केहन हेतनि। ब्रह्मा कहल- “अहाँ लोकनि एहि लेल चिन्ता जुनि करू। सब कल्याणे होएत। मुदा एतबा अवश्य ध्यान रखैत जाउ जे यदि गौरीक पेटसँ सन्तान हैत तऽ से समस्त संसारकेँ नाश कए देत। तैँ हेतु अहाँ लोकनि महादेवकें संभोगसँ निवृत्त करबाक उपाय करैत जाउ।”

सब देवता वनमे जा कए हल्ला करए लगलाह। हल्ला कएलासँ महादेवक ध्यान टूटल आ संभोगसँ निवृत्त भेलाह। महादेव संभोगसँ उठलाह तैँ हुनकर अंश पृथ्वी पर खसि पड़लनि। गौरीकें एहिसँ बड़ क्रोध भेलनि। ओ सब देवता कए श्राप देल जे आइ सँ कोनो देवताकें संभोगसँ बच्चा नहि हेतनि।

महादेवक अंशकें पृथ्वी सहन नहि कए सकलीह। ओ अंश आगिमे फेकि देलनि। आगि सेहो भारकेँ नहि सहि सकलाह। ओ ओहि सरपत वनमे फेकि देलनि। सरपत पर जा कए ओ अंश छओ मुँह वाला एकटा बच्चा भए गेल। ओहि बाटे कृतिका सब जाइत छल। ओ सब कनैत बच्चाकें उठाए लेलक। अपन-अपन दूध पिआए ओहि बच्चाकें ओ सब पोसलक। पैघ भेला पर बच्चाकें सब तरहक शिक्षा देलक। बच्चाकें पोसनिहारि कृतिका सब छलि। तैँ हेतु ओहि बच्चाक नाम कार्त्तिकेय पड़ल। गणेशजीक जन्माक बाद जखन गौरी-शंकरकँ पता लगलनि कार्त्तिकेयक जन्मक तैँ कार्त्तिकेयकें बजा लेलखिन। देवता लोकनि हुनकर अभिषेक कएल आ' अपन सेनापति कार्त्तिकेयकेँ बनाओल। कार्त्तिकेय ताड़कासुरकेँ मारल आ इन्द्रकें अपन राज्य वापस कए देल। हुनकर विवाह साठिसँ भेल।

गणेशक जन्म

देवता लोकनि द्वारा प्रथम संभोगमे बाधा होएबाक कारणेँ गौरी चिड़चिड़ाहि भए गेलीह। ओ सतत रुष्ट रहैत छलीह। कार्त्तिकेयक जन्म ताबत भए गेल छलनि, किन्तु हुनका लोकनिकें एकर खबरि नहि छलनि। महादेव गौरीकें प्रसन्न करबाक हेतु बहुत चेष्टा कएलनि किन्तु ओ प्रसन्न नहि भेलीह। महादेवकें एकरा लेल बड़ चिन्ता भेलनि। ओ एक दिन गौरीसँ पुछलनि जे “अहाँ एना कियैक करैत छी? अहाँ कोना प्रसन्न रहब से हमरा स्पष्ट कहू।” ओ कहलनि “अहाँ अन्तर्यामी छी। अहाँ सभक मनक बात बूझि जाइत छियैक तखन हमर मोनक बात अहाँ नहि बूझैत छी से हमरा कोना विश्वास होएत। मूर्ख पतिकें स्त्री सब बात कहैत छैक, किन्तु हे स्वामी, अहाँ तँ अन्तर्यामी छी, हम अहाँकेँ कहब तखन अहाँ बुझबैक? यदि अपने हमरा पूछल अछि, तँ हम अपनेक आज्ञा केँ कोना नहि मानव। सुनू-स्त्रीगणक लेल संसारमे सबसँ पैघ सुख नीक पुरुषक संग संभोग करब थीक। ओहि संभोगमे यदि कोनो प्रकारक बाधा होइत छैक तँ एहिसँ बढ़ि कए स्त्रीजातिक लेल कोनो दुख नहि होइत छैक। एहि दुखसँ स्त्री दिनानुदिन खिन्न आ झख्वी स्वभावक भए जाइत अछि। आब अपनेहि सोचू जे हमरा केहन भारी दुःख अछि। एक तँ संभोगमे विघ्न, दोसर अपनेक अंश पृथ्वी पर खसि पड़ल, आ सबसँ पैघ दुःख तँ ई जे एखन तक निःसन्तान छी। जकर पति स्वयं त्रिलोकीनाथ तकरा बेटा नहि? जाहि स्त्रीकें बेटा नहि तकर जीवन व्यर्थ थीक। तपस्या, योग, दान इत्यादि नीक कर्म आन जन्ममे काज दैत छैक मुदा नीक बेटा इहलोकि आ परलोक सब ठाम सुख दैत छैक। हे प्राणनाथ, अहाँ सर्वोपरि सर्वज्ञ छी। हम आब कोन उपाय करू, कृपया अपने हमरा कहू।”

पार्वतीक बात सुनि महादेव कहलनि- “हे प्रिये! निराश नहि होउ। सब बातक उपाय छैक। माघ सूदि त्रयोदशीसँ सुपुष्यक नामक विष्णुक व्रत आरम्भ होइत छनि, आ' से भरि साल चलैत रहैत छै। एहि व्रतमे बड़ खर्च आ कष्ट होइत छैक मुदा तुरत फल देनिहार एहन दोसर कोनो व्रत नहि छै। अहाँ चिन्ता नहि करू। हम सब प्रबन्ध कए देब। कोनो वस्तुक तकलीफ नहि होयत।”

गौरी प्रसन्न भय अगिला माघसँ सुपुष्यक व्रत आरम्भ कए सविधि समाप्त कएल। व्रत समाप्त कए गौरी महादेवक संग कैलाशक एक सुन्दर निर्जन स्थानमे सुखविलास करए लगलीह। जखन महादेवकर अंश खसबायक समय भेलनि तखन भगवान विष्णु एक बूढ़ तपस्वी ब्राह्मणक रूपमे ओतय <text_اعتراض>गेलाह आ हाक पारल- “परम पिता महादेव आ जगन्माता गौरी, अहाँ लोकनि कतए छी? हम भूखे मरि रहल छी। किच्छु खुआउ, आ हमर प्राणक रक्षा करू।”

भूखल ब्राह्मणक हाक सुनि दुनू गोटे धड़फड़ा कए उठि दौड़लाह। एहि बीच महादेवक अंश पलंग पर खसि पड़लनि। गौरी-महादेव, ब्राह्मणक आदर सत्कारमे लागि गेलाह। हुनका पूछि-पूछि कए भोजन करबए लगलाह। एकाएक ब्राह्मण देवता अन्तर्ध्यान भए गेलाह। ओहि समय मे आकाशवाणी भेल- “अहाँक व्रतक फल पलंग पर खेला रहल अछि। जाउ, पुत्रकें देखि जीवन सफल करू।”

आकाशवाणी सुनि गौड़ी दौड़लीह। देखैत छथि एक सुन्दर बच्चा पलंग पर खेला रहल अछि आ अपन अंगुठा चोभि रहल अछि। दूनू गोटेकें असीम आनन्द भेलनि। कैलाश पर उत्सव मनाओल गेल। देवता लोकनि आबि बच्चा केँ आशीष देल। हिमालय सेहो सपरिवार आएलाह। बच्चाक नाम गणेश राखल गेल। एहि उत्सवमे शनि महाराज सेहो आएल छलाह। गौरीक आग्रह कएला पर ओ बच्चाकें अछेपे देखल। लगले गणेशक गरदनि काटि देल। भगवान विष्णु तुरत एक विशिष्ट हाथीक गरदनि काटि गणेशक धड़मे जोड़ि देल आ अमृत छीिट हुनका जिआओल। ओहि दिनसँ गणेशक मुँह हाथीक मुँह सन छनि। एहि उत्सवमे गौरी महादेवकें देवता लोकनिसँ पता लगलनि जे हुनकर प्रथम संभोगक फलस्वरूप कार्त्तिकेय केर जन्म भए गेल छनि। ओ कृतिका लोकनिक संरक्षणमे छधि। गणेशक विवाह दक्ष प्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलनि।

गौरीक (नाग) दन्त कथा

हिमालयकें चारिम बेटी बड़ गोरि भेलथिन। तैँ हुनकर नाम गौरी पड़लनि। गौरी जखन विवाह योग्य भेलथिन तैँ मनाइन हिमालयकें कहए लगलथिन- “अपने बैसल छी। कन्यादानक कोनो व्यबस्था नहि करैत छी। कोनो बुढ़वा अबैत अछि आ बेटीकें लए जाइत अछि। ई नीक बात नहि थीक। कोनो व्यक्तिकें पटा कए नीक वर तकबाउ। जाहि तरहें नीक लोक सब कन्यादान करैत अछि एहि बेर तहिना कन्यादान करब।”

हिमालय सोचए लगलाह जे एहन के लोक छथि जे सब ठाम जाइत अछि। सबहक गुण-दोषकेँ जनैत अछि। एकाएक हुनका नारद मुनिक स्मरण भेलनि। ओ नारद मुनिकें वर तकबाक भार देल आ विवाहक ओरियाओन करए लगलाह।

नारद मुनि पुनः ओहि बुढ़बा महादेवकें वर ताकल। खूब साजि वर-वरियाती आएल। दाई-माई सब वर-वरियाती देखए गेलीह। देखैत छथि जे वरक आँखि मे काँची-पीची लागल आ' भरि देह साँप लटकल छनि। बरियातीमे कियो कनाह तैँ कियो खोंड़, कियो नाडर तैँ कियो लुल्ह। सब स्त्रीगण सब नारद मुनिकें गारि देमय लागल, आ वर-वरियातीकें घुमाबए लागल। जखन गौरी ई बात बुझलनि तैँ ओ मोने-मोन महादेवक प्रार्थना कएल आ नीक रूप धारण करबा लेल गोहराओल। महादेव सएह कएल। तुरत सब साँप बिला गेल। अपने सुन्दर पीत पटम्बर पहिरने शंकर रूप भए गेलाह। हुनकर एहन सुन्दर रूप देखि सब कियो चकित भए गेल शुभ-शुभ कए विवाह सम्पन्न भेल। मनाइन खुशीसँ बेटी, जमाएकें विदा कएल। महादेव गौरी संग खुशीसँ रहय लगलाह।

विदाइक भार

बेटी जमाएकें विदा कए मैना किच्छु दिनक बाद विदाइक भार पठाओल। दही, केरा, खाजा, लड्डू, चूड़ा, ठकुआ, मालपूंआ इत्यादि। महादेवकें एतेक वस्तु रखबाक ने जगह छलनि आ ने घरमे खएनिहार छलाह। खूब लोक सबकें बजाए खोआओल आ कतबो बैनो-तिहार बाँटल, किन्तु वस्तु सब सधवे नहि करनि। भारसैँ घर-आँगन गन्हाए लगलनि। भारक वस्तु कोना सधत तकर उपाय सोचय लगलाह। एक गोटे कहलक जे यदि भड़कनि छुलाहि धुरखुर धए ठाढ़ि होएत तैँ भण्डार सधि सकैत अछि। खोज पुछारी कए एकटा भड़कनि छुलाहि ताकल गेल। ओकरा धुरखुर सटाए ठाढ़ि कएल गेल। तखन भारक वस्तु सब सधल।

गौरीक ननदि

गौरी महादेव सैं एक दिन कहलनि जे सबहक ननदि अबैत छैक, हमरा सेहन्ता होइत अछि जे ननदि अबितथि। ताहि पर महादेव कहलनि, “अहाँ ननदि केर भार सहि सकब?” तखन गौरी कहल- “एतेक लोक कोना ननदिक भार सहैत अछि। हम किएक ने सहि सकब।” महादेव तुरंत अपन बहिन आशाबरी देवीकें बजाओल।

आशाबरी देवीकें पैरमे बेमाय फाटल छलनि। ओ हँसी-ठट्ठामे गौरीकें ओहि बेमायमे नुकाए रखलनि। ओही बीच महादेव आँगन अएलाह, गौरीकें ताकल किन्तु गौरी नहि भेटथिन। गौरी बेमाएक भीतरमे कनैत छलीह। महादेव अपन बहिन आशाबरी सैं पूछल, अहाँक भाउज कतए छथि। ओ कहलनि, हम नहि देखलियनि अछि। महादेव परम चिन्तित भेलाह। आशाबरी देवी अपन पाएर जोर सैं झारल, गौरी भट दए खसलीह। दूनू प्राणी भभा कए हँसए लगलाह।

एक दिन महादेव बहुत रास माछ आनल। गौरी विन्यास सँ माछ बनबौलनि। ननदि (आशाबरी) केँ कहलनि जे अहाँ धी-सुआसिन छी, पहिन अहाँ खा लिअ तखन हम सब खाएब। ओ माछ खाए लगलीह। गौरी खण्डक-खण्ड माछ हुनका देने जाथिन आ ओ टपाटप खएने जाथि। एहि तरहें आशाबरी देवी सबटा माछ खाए गेलीह। बेचारी गौरीकें काँटो कनरखुर नहि प्राप्त भेलनि। आब गौरी अकच्छा कए महादेबसँ कहलनि, आब हिनका विदा क' दिऔन। एहन ननदिसँ हम बाज एलहूँ।

महादेव हँसए लगलाह आ कहल- हम पहिनहि मना करैत छलहूँ जे अहाँ ननदिक भार नहि सहि सकब, किन्तु अहाँ जिद्द कए देलहूँ। एतबे दिनमे तंग भ' गेलहूँ? किच्छु दिन आओर रखिऔन तखन सब सेहन्ता पूरि जाएत। गौरी नेहोरा करय लगलीह- हम गोड़ लगैत छी। जल्दी हिनका विदा क' दिऔन नहि तऽ आब हमरो खा जयतीह। महादेव बुझा-सुझा कए अपन बहिन (आशाबरी देवी) केँ विदा कयल।

गौरीके भागिन

महादेबसँ पुनः गौरी एक दिन कहलनि- “हे नाथ! सबहक भागिन अबैत जाइत छै मामीसँ हँसी-खेल करैत छैक। हमरो तकर बड़ सेहन्ता होइत अछि।”

महादेव बिहुँसैत कहलनि-ननदिक सेहन्ता तऽ नीक जकाँ पूरि गेल। आब भागिनक सेहन्ता सेहो पूरि जाएत, मुदा हमरा बादमे उलहन नहि देब। गौरी गंगाजल भराए गेलीह। खूब जोर पुरबा-पछबा बहाए लागल। हुनका अपन कपड़ाक सम्भार नहि रहनि। कतबो सम्भारथि तैओ आँचर उधिया जाइन। गौरी लाजे कठौत होमए लगलीह। ओ महादेव सैं कहलनि- “देखू तऽ हमरा ई बसात आब बेनग्न कए देत।”

महादेव कहलनि- “ई बसात पुरबा-पछबा अहाँक भागिन छथि।” ई लोकनि अहाँक सेहन्ता पुराए रहल छथि। दूनू गोटे मिलि क' अहाँसँ हँसी-ठट्ठा आ धूर्तता करैत छथि। हँसि क' गौरी कहलनि- इह! जहिना अहाँक पार कियो नहि पाबि सकैत अछि तहिना सर-सम्बन्धी आ बहिन-भागिनक पार कियो नहि पाओत। आबहुँ अपन भागिनफैँ हटाउ।” महादेवक इशारासँ बसात रुकि गेल।

गौरी छिनारि

एक समयमे महादेवकें गौरी कहलनि- “हे महादेव! अहाँ त्रिलोकीनाथ छी अहाँ चोरनी आ छिनारिकें कोनो चिह्न किएक ने दैत छिएैक? अहाँ तऽ सब किच्छु कए सकैत छी।” महादेव कहलनि- “हम अहाँक बात मानल, मुदा ककरा कोन चिह्न देल जाइत से अहीं कहू।”

गौरी कहल- “छिनारिकें सिंघ आ चोरनीके नाडर दिऔक।” एक दिन गौरीसँ महादेव कहलनि- जे आइ हमरा माछ खएबाक इच्छा होइत अछि। अहाँ माछ खोआउ। गौरी माछ लाबय गेलीह। मल्हाटोलीमे माछ नहि भेटलनि तऽ ओ धारक कात बिदा भेलीह। ओताए महादेव स्वयं मछवारक रूपमे माछ मारैत रहथि। गौरी मछवारसँ कहलनि- “हौ मछवार! माछ छह? की भाव देभक?” मछबार कहलक- “आइ हमरा बेचक नहि अछि। यदि अहाँकें माछ लेबाक बड़ खगता अछि तऽ हमर मनक बात पूरा कए दिय, हम मँगनियेमे माछ दए देब।” ओ अनुचित बात कहलकनि। गौरी असमंजसमे पड़ि गेलीह। माछ कतहु नहि भेटलनि आ महादेवकें आइये माछ खयबाक इच्छा छलनि। ओ हुनक इच्छा पुरेबाक प्रयासमे छलीह। एहि बीच गौरीकेँ माथ पर सिंघ उगि गेलनि। ओकरा कतबो झाँपथि ओ बढ़ले जाइन। महादेव हँसैत बजलाह, आइ तँ अहाँ देखारि भ' गेलहूँ। गौरी लजा गेलीह। ओ कहलनि, हे महादेव! अहाँक पार के पाबि सकैत अछि। जे जे हमरा सैं कराबी।

गौरी चोरनी

एक दिन महादेव हड़बड़ाएल अयलाह आ गौरीसँ कहलनि, जे हमरा जल्दी सैं भोजन कराउ, बहुत आवश्यक अछि। ओही समयमे गौरीकें दीर्घशंका लागि गेलनि। कतबो रोकलनि किन्तु नहि रुकनलनि। ओ शीघ्र ओहि शंकासँ निवृत्त भ' ढाकनसँ झाँपि देलनि। महादेव झाँपल वस्तुकें देखि क' गौरीसँ पूछल जे चोरा क' ई की रखने छी? गौरी लाजे कठौत भ' गेलीह। ओ की कहितथिन किच्छु नहि फुराइनि। गौरीकेँ एहि बीच बड़ पैघ नाढरि लटकि गेलनि। ओ परेशान भ' गेलीह। अन्तमे ओ महादेवकें कतेक उचिती मिनती कयलनि- “हे महादेव! आब अपन भाभट समेटू। हम जे किच्छु अहाँकेँ कहैत छी से हमरहि पर बजारि दैत छी।

एगारहम दिनक कथा

संध्याक विवाह आ लीलीक जन्म

हिमालयक पाँचम बेटी संध्या भेलथिन। ओ गौरी सँ छोटि रहथिन। तथापि गौरीक विवाहमे ओ महादेव सैं हिलि-मिलि गेल रहथि। महादेव हुनका बड़ मानैत रहथिन्ह। जखन संध्या विवाह योग्य भेलीह तऽ महादेव हुनका सैं विवाह करबा लेल गौरी सँ चोरा कय गेलाह। गौरी महादेवकें नहि देखि चिन्तित भेलीह। ओ हुनका तकने फिरथि मुदा महादेव कतहु नहि भेटलथिन। गौरीकें पता लगलनि जे महादेव संध्या सैं विवाह करबा लए गेल छथि। गौरी शोकातुर भए गेलीह। ओ कानए लगलीह। कनैत-कनैत शरीर सैं घाम चलय लगलनि। घाम चलला सैं देह सैं मैल छुटय लगलनि। सब मैलकें गौरी जमा कयलनि आ' एकटा साँपक आकार बनाए ओकरा बीच बाट पर राखि देलनि। जखन महादेव विवाह क' क' घुरलाह, त' देखैत छथि जे गौरी हबो ढकार भए कानि रहल छथि आ' बाट पर मैलक साँप राखल छैक। ओ ओहि मैलक साँपमे प्राण दए देल। ओ साँप लहलहाए लागल। महादेव गौरी सैं कहलनि- “अहाँ किएक कनैत छी? ई साँप अहाँक बेटी थीक। एकरहि खेलएबा लेल हम एकटा कनियाँ आनल अछि।” गौरी ई कथा सुनि भभाकय हँसय लगलीह। ओहि साँपक नाम लीली राखल गेल।

लीलीक विवाह

नाहर नामक एक राजा ओ ताँती नामक रानी रहथि। हुनका एक सय बेटा रहनि बैरसी जेठ ओ चनाइ हुनका सँ छोट बेटा रहथिन। बैरसी नौकरी लेल महादेवक ओतय गेलाह। महादेवकें एकटा बेटी लीली रहथिन। हुनका एकटा नोकरक खगता रहनि। महादेव बैरसीकें नोकर राखि लेलनि। एक दिन महादेव बैरसीसँ कहलनि- “लीलीकें धर्मकुण्डमे स्नान करा देबनि आ सोहाग कुण्डमे अंगूठा डूबा देबनि।” बैसरीकेँ सुनबामे धोखा भेलनि। ओ उलटे कए देलथिन। धर्मकुण्डमे अंगूठा बोरा देलथिन आ सोहाग कुण्डमे नहा देलथिन। तैँ हेतु लीलीकेँ सोहाग तऽ बड़ पैघ भेलनि मुदा धर्मक लेशमात्र नहि रहलनि। लीली विवाह करबा योग्य भेलीह। वर तकाए लागल लीली जखन सुनलनि तऽ ओ कहलनि, हमरा लेल वर तकबाक काज नहि, हम बैरसी सँ विवाह करब। बैरसीक विवाह लीलीसँ भेलनि।

रवि दिनक कथा

पतिव्रता सुकन्याक कथा

एकटा राजा छलाह। हुनका सन्तान नहि छलनि। सन्तान लेल ओ चारिटा विवाह केलनि सबसँ छोटकी रानी सँ एक कन्याक जन्म भेलनि। ओ परम सुन्दरि आ सुशील रहथि। नाम राखल गेलनि सुकन्या। सुकन्याक स्वभाव तेहन छलनि जे चारू माय हुनका खूब मानैत छलनि। राजा सेहो सुकन्याकें बड़ मानैत छलथिन। जतए ओ जाथि सुकन्याकें संग नेने जाइत छलाह। एक दिन राजा भोरमै टहलक लेल निकललाह। हुनका संग बहुत अमला सब छल। संगमे सुकन्या सेहो रहथिन। राजा हास्य विनोद करैत जा रहल छलाह। सुकन्या एक पोखरि लग टहलैत छलीह। ओ देखलनि जे एकटा दिबड़ाक भीड़ जकाँ किच्छु छैक आ' ओहिमे दूटा किच्छु चमकैत छैक। हिनका उत्सुकता भेलनि ओहि चमकैत चीज पर जे ओ की थिकैक। ओ अपन आँगुर सँ ओहि चमकैत वस्तुकें खोदलेखिन। खोदला सँ हुनका आँगुरमे सोनित लागि गेलनि। तखन ओ एकटा काठी सँ ओकरा खोधि देखलखिन। ओहि चमकैत बस्तु सँ सोनितक धार बहए लागल। तखन सुकन्या डेरा गेलीह आ भागि गेलीह। ओहि दिबड़ाक भीड़मे एक मुनि तपस्या करैत छलाह आ चमकैत वस्तु हुनक दूनू आँखि छलनि। काठी भोकला सँ हुनकर आँखि फूटि गेलनि। ओ दर्द सँ चिचिआ उठलाह। भीतर सँ राजा-राजाक शब्द आएल। राजा ओताए गेलाह आ सब किच्छु देखल। एक मुनि तपस्या करैत छथि, आ' हुनका शरीर पर दियराक भीड़ भऽ गेल छलनि। आँखिटा देखाइत छलनि। सेहो सुकन्याक बचपना सँ फूटि गेलनि। राजा राजमहल आबि अपन 'ज्योतिष-पण्डितकें' बजाओल। हुनका सँ बात कएला। पण्डित लोकनि कहल जे मुनिक आँखि फूटि गेलनि ई बड़ गल्ती भेल। मुनिसँ क्षमा याचना कएल जाय। राजा ओहि मुनि ओताए गेलाह आ क्षमा-याचना कएल। राजा कहल-हे मुनि ! हमरा कन्या सँ बड़ पैघ अपराध भेल, कृपया क्षमा कएल जाय। मुनि कहलनि-अहाँक बेटी हमर आँखि फोड़ि देलनि। हम आन्हेर भए गेलहूँ अहाँ अपन बेटीकें कुटीमे छोड़ि दिअनि। ओ हमर सेवा-सुश्रूषा करतीह।

राजाकें मुनिक बचन सुनि बड़ दुख भेलनि। ओ राजमहल आबि खटबासि धए लेल। एकेटा बेटी छलि, ओहो मुनि माँगि रहल छलथिन।

राजा सब वस्तुक संग राजकुमारीकें विदा करबाक तैयारी कएल। किन्तु सुकन्या किच्छुओ संगमे नहि लेलनि। ओ नीक वस्तु आ' आभूषण उतारि देल आ वनफूल पहिरि सबसँ मिलि-जुलि कए मुनिक आश्रम विदा भेलीह। ओताए जाए ओ मुनिक सेवा मन लगा कए करए लगलीह। सुकन्या प्रतिदिन स्नान करबा लेल गंगाजी जाधि। एक दिन रास्तमे हुनका अश्वनी कुमार सँ भेट भेलनि। अश्वनीकुमार सुकन्या सँ पूछल जे आहाँ राजाक बेटी छी, अहाँ एसगरि कतए जाइत छी? सुकन्या सब बात हुनका कहलधिन। अश्वनीकुमार सुकन्याक सुन्दरताक वर्णन कएल आ कहल जे हमरा सँ विवाह करू। सुकन्या हुनकर वचन सुनि तमसा कए कहलनि-हम सती छी। हम श्राप देब तँ अहाँ भस्म भए जाएब। फेर एहन कथा हमरा नहि कहब। अश्वनीकुमार हुनका सँ कहलनि-यदि आहाँ मुनिकें हमरा संग गंगा स्नान करबियनि तँ ओ हमरे सन सुन्दर भए जेताह। दोसर दिन सुकन्या मुनिक संग गंगा स्नान करबा लेल गेली। तींनू गोटे गंगामे डुबकी लगौलनि। अश्वनीकुमार आ' मुनि एक रंग भ' गेलाह। सुकन्याकेँ दूनूके चिन्हब कठिन भऽ गेलनि। ओ असमंजसमे पड़ि गेलीह। ताबत हुनका मोन पड़लनि जे देवताक पिपनी नहि खसैत छनि। ओ तुरत अपन स्वामी मुनिक हाथ पकड़ि लेलनि। अश्वनीकुमार तँ चाहैत छलाह जे धोखा सँ हमर हाथ पकड़ि लेतीह तँ हम हुनका सँ विवाह कए लेब किन्तु हुनकर विचारल बात मोनमे रहि गेलनि। सुकन्या प्रसन्न भए अपन देवी-देवताकें प्रणाम कएल। अपन स्वामीकेँ देखि प्रसन्नता भेलनि। ओ मुनिक संग सुख सँ रहए लगलीह।

किच्छु दिन बितला पर सुकन्याक मायकें मोन पड़लनि जे सुकन्या असगर वन गेलीह। वनमे बाघ-सिंह आ' कतेक तरहक हिंसक जानवर सब रहैत छैक। एहि सैं हुनका मोनमे कतेक तरहक आशंका होमय लगलनि। बूढ़ा तपस्वी सेहो मरि गेल होएताह।

एक दिन राजा-रानी सुकन्याक खोज-खबरि लेबाक लेल बन गेलाह। ओ देखलनि जे राजकुमारी सुकन्या बड़ सुन्दर पुरुषक संग रहैत छथि। हुनका लोकनिकें मनमे भेलनि जे आब ई ओहि बुढ़बा तपस्बीकें छोड़ि एकरा संग रहैत छथि। सुकन्या अपन माए-बापकें देखलनि तँ हुनका लोकनिकें सत्कार करबाक लेल आगू बढ़लीह। माए कहलखिन-हम अहाँक ओताए नहि जाएब, अहाँ हमरा लोकनिक नाम हँसा देलहुँ। सुकन्या कहलनि-ई सब अहाँक आशीर्वादसँ भेल। अहाँ लोकनि जखन सब बात सुनब तखन विश्वास करब। जखन ओ अपन जमायसँ सब बात सुनलनि तखन विश्वास भेलनि जे सुकन्या निर्दोष छथि। हिनका पर बेकार कोनो तरहक शंका कयलहुँ। राजा रानी प्रसन्न भ' अपन घर एलीह। राजा अश्वमेध यज्ञ केलनि ओहिमे बेटी-जमायकें बजौलनि। देवता सबकें सेहो निमन्त्रण देलनि देवता लोकनि एके पाँती मे भोजन करय बैसलाह। ओहिमे अश्वनीकुमार सेहो भोजन करय बैसलाह। मुदा देवता सब हुनका एक पाँतीमे बैसए नहि देबय चाहैत छलाह। राजाक कहला-सुनला पर खाए देखलखिन। सब खुशी-खुशी बेटी-जमायकेँ आशीर्वाद दैत अपन-अपन घर गेलाह।

बारहम दिनक कथा

बाल-बसन्त

एक ब्राह्मणकें सात गोट बेटा छलनि। छोटकी पुतहु गरीब घरक रहथिन। तैँ हुनकर सासु हुनका नहि मानैत छलथिन आ' नीक-नीकुत खाय नहि दैत छलधिन। जखन छोटकी पुतहु गर्भवती भेलखिन तऽ हुनका नीक-नीक वस्तु सब खेबाक मोन होमय लगलनि, मुदा सासु सेहन्ताक कोनो बस्तु खाए नहि देखिन। एक दिन ओ हारि क' अपन स्वामीकेँ कहलनि जे हमरा खीर-पूरी खएबाक मोन होइत अछि। हुनकर स्वामी अपन मायकें कहलनि जे हम खेत जाइत छी हमरा लेल आइ खीर-पूरी बना क' कनियाँ हाथे पठा देब। माय परम सन्देही रहधिन। हुनका भेलनि जे खीर-पूरी अपने नहि खाए कनियाँकेँ खोआ देत। तैँ हेतु ओ कनियाँक जीह पर किच्छु लिखि देलनि आ कहलनि-जाबत धरि अहाँ खेत परसँ घुरि कऽ नहि आयब ताबत धरि जीह पर लिखल रहबाक चाही। तखन खीर-पूरी लऽ कऽ कनियाँकेँ खेत पर पठौलनि।

कनियाँ खीर-पूरी ल' खेत पर पहुँचलीह। आधा हुनकर वर खेलनि आ आधा कनियाँकेँ खाय लेल कहलनि। कनियाँ कहलनि-हम कोना खाउ। अहाँक माय हमरा जीह पर किच्छु लिखि देने छथि। खेलासँ ओ मेटा जायत तऽ ओ बड़ फज्झति करतीह। वर कहलखिन खीर-पूड़ीकें कतहू नुका कऽ राखि लिअऽ, जखन माय अहाँक जीह देखि लेतीह, तकर बाद आबि क' खाए लेब। कनियाँ एकटा पीपरक गाछक धोधरि मे ओहि खीरपूरी कैँ नुकाकऽ राखि घर गेलीह। हुनकर सासु हुनकर जीह देखलनि। तखन कनियाँ कोनो लाथे खीर-पूरी खाए लेल ओहि पिपरक गाछ लग पुनः गेलीह तखन कतहू हुनका खीर-पूरी गाछक धोधरिमे नहि भेटलनि। ओहि धोधरिमे एक विहरि छलैंक ओहिमे एक नागिन रहैत छलैंक। ओ गर्भवती छल। ओ सबटा खीर-पूरी खाए गेल। कनियाँकें बड़ दुख भेलनि जे एतेक प्रयलक बादो खीर-पूरी खाएब हुनक भाग्यमे नहि छलनि। ओ खीर-पूरीकें चारू कात ताकए लगलीह आ बाजए लगलीह।

आशा भेल निराश, साँझर भेल पलास।

जे मोरा खाएलनि खिरिया-पुरिया, तनिको पूरनि आश।

किच्छु दिनक बाद दूटा बच्चा ओहि नागिनकेँ भेलैक। जाहि बाधमे ब्राह्मणीक खेत छलनि ताहि बाधमे नागिनक दुनू पोआ खेलाइत छलैंक। एक दिन ओहि पोआकें चरवाह सब मारए दौड़ल। पोआ भागि कऽ ब्राह्मणी लग चल गेल। हुनका बड़ दया लगलनि। ओ झट दऽ ओकरा पथियासँ झौंपि देलनि। चरबाह सब आबि कनियाँकेँ पुछलकनि जे दू टा पोआ साँपक देखलियैक अछि, तऽ ओ उत्तर देलनि जे एमहर नहि आएल अछि। जखन ओ सब चल गेल, तखन पथिया उघारि देखलखिन। दुनू पोआ चल गेल।

घर जाए दुनू पोआ अपन माएसँ कहलक जे एकटा ब्राह्मणी हमरा लोकनिक प्राण बचौलक, नहि तैँ चरबाह सब खेहारि कए हमरा दूनू गोटकेँ मारि देत।

एक पोआक नाम बाल ओ दोसर पोआक नाम बसंत रहैक। माए ओकरा कहलकैंक जे ई बात मोन रखिहैं-“जे तोहर उपकार करौक तकर तोहूँ सब उपकार करिहैंक।”

दूनू पोआ दोसर दिन पुनः ओहि बाधमे खेलाय गेल। कनियाँ अपन खेत पथार देखबाक हेतु बाध गेल रहथि। हुनका देखि पोआ बाजल-“हमरा लोकनि वासुकी नागक बेटा छी। काल्हि अहाँ हमरा दुनू भाइक प्राणक रक्षा कयलहुँ तैँ हेतु हम सब प्रसन्न छी। जे वरदान माँगक रहए से माँगू। कनियाँ कहलनि-“हमरा नैहर आस होअए से वरदान देल जाय।”

दोसर दिन मनुष्य रूप धारण कए दुनू भाय कनिजाक ओतय पहुँचलाह। ओताए कनिजाक सासु, भैसूर ओ वरसँ कहलधिन-'हम दूनू कनियाँक भाय छियनि। हमरा लोकनिक जन्म हिनकर द्विरागमनक बाद भेल। एतए सैं अवरजात नहि रहला सँ अपने लोकनि हमरा लोकनिकें नहि चिन्हैत छी। हम अपन बहिनकें विदागरी करैबा लेल आएल छी। कृपया विदागरी कए देल जाए।”

कनिजाक मन आ' दूनू भाइक हठ देखि विदागरी कए देल। थोड़ेक दूर गेलाक बाद एक पैघ विहरि भेटल। ओहि विहरि मे तींनु गोटे प्रवेश केलनि ओहि विहरि सैं निकललाक बाद कनियाँकें नीक कोठा-सोफा भेटलनि। वासुकिनी मनुष्य रूप धए कनियाँक स्वागत कएलनि। ओ सुख सँ ओतय रहय लगलीह। कनियाँ सैं वासुकिनी कहलनि-सुआसिन केर काज छैक जे ओ इजोत केने रहए। तैँ हेतु अहाँ प्रतिदिन साँझमे दीअठि पर दीप जराउ। अहाँ आराम सँ रहू, आ खाउ-खेलाउ।

कनियाँ नित्य संध्या काल दीप लेसि दीअठि पर राखि देधि। ओ जकरा दीअठि बूझि कए दीप राखि देथि, से वासुकीनागक फन छल। साँझ कए वासुकीनाग चकरी मारि बैसथि आ फनकें ऊपर कए लेथि। ओ ओकरे दिअठि बूझि दीप राखय।

दीप गरम भए गेला सँ वासुकीनागक फन पाक्य लागनि। किच्छु दिन तऽ सुआसिन बुझि एहि कष्टकें ओ सहलनि। जखन ओ असह्य भए गेलनि तैँ वासुकिनी सँ कहलनि-“ई मनुष्य सब दिन हमर चानिकें झरकबैट अछि। साँसे चानिमे हमरा फोंका भए गेल अछि। आब हमरा सहि नहि होइत अछि। हम आब एकरा डँसि लेबैक।”

वासुकिनी विनती करैत कहलनि-“सुआसिनक सुख साधारण नहि छैक। जखनहि ओकर जन्म होइत छैक, तखनहि सैं बापक चानि तबए लगैत छैक। केहन एकर स्वभाव हेतैक, घर-वर केहन हेतैक, कोना ई अनचिन्हारक संग समय काटत, सासुरमे ई यश देत की अयश' ओतय एकरा सुख हेतैक की दुख, एहि सबक चिन्ता सैं बेटीक बापक चानि सतत गरम रहैत छैक। एतए अपने एकरा किच्छु नहि करियौक, नहि तऽ हमरा बड़ अयश होएत। हम एकरा एतएसँ काल्हि विदा कए दैत छियैक। सासुर गेलाक बाद जे फुरए से करब।”

दोसर दिन वासुकिनी नुआ, लहठी, गहना-गुड़िया दए जेना बेटीक विदागरी मे ओरियान होइत छैक, कए कनिजाकें बाल वसन्तक संग विदा कए देलनि। जाइत काल वासुकिनी कनियाँसँ कहलनि से सासुरमे राति कए सुतए काल ई मंत्र पढ़ि लेल करब तखन सूतब-

“दीप-दिपहरा जागू हरा मोती मानिक करू घरा।

नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन विषहरा बढ़थु।

बाल वसन्त भैया बढ़थु, दाड़ि-खोड़ि मौसी बढ़थु।

आशावरी पीसी बढ़थु, सोना-मोना मामा बढ़थु।

राहि शब्द लए सुती, काँसा शब्द लए उठी।

होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ।

साँझ सूती, प्रात उठी, पटोर पहिरी, कचोर ओढ़ी।

ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट।

भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे अओता

ईश्वर महादेवा, पड़ए गरुड़ के ठाठ।

आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक।”

वासुकी किच्छु दिनक बाद ओहि कनिजाकें डँसबाक लेल गेलाह। कनिजा सब राति सुतबासं पहिने वासुकिनीक देल मन्त्र पढ़ि लैत छल। मन्त्र सुनि कए वासुकी नागकेँ डँसबाक साहस नहि होनि। ओ घुरि कए चल जाथि। तीन दिन धरि जखन मौका नहि लगलनि सब राति कनियाँ मन्त्रक जप कए लैत छलीह तखन चारिम दिन तमसा कए वासुकी नाग हुनकर सासुकें डँसि लेलनि आ' द्वारि पर तीन बेर अपन नागरि पटक कए वापस चल गेलाह। कनिजाँक घर सोना-चानी ओ अन्य कीमती वस्तु सबसँ भरि गेल। ओ सुखसँ रहए लगलि।

गोसाउनिक कथा

मधस्थ नामक एकटा राजा रहथि। हुनका एक सए एक गोट बेटी छलनि। पैघ बेटीक नाम गोसाउनि रहनि। ओ सुन्दरि आ' सुलक्षणि रहथि। जखन ओ विवाह करबाक योग्य भेलधिन्ह तऽ राजा विचारलनि जे एहन वर भेटैत जे ओहो एक सए एक भाय रहैत तऽ सब बहिनिक विवाह एके ठाम भए जाइत। तेहने वर ताकल जाए लागल। संयोगसँ नाहर राजाक बेटा बैरसी भेटलथिन। ओहो एक सए एक भाय छलाह। हुनकासँ छोट भाय चनाइ रहथिन। कथा बैरसीक एक सए भाइक विवाह गोसाउनिक एक सए एक बहिनिसँ भेलनि।

बैरसीक विवाहक कालमे हुनका पागसँ एक साँप खसलनि। ओ साँप लावा बिछि-बिछि खाए लागल। सबकें आश्चर्य भेलैक। एहि समयमे साँप कतए सँ आएल। पाछौँ सब बुझलक जे ई साँप बैरसीक प्रथम स्त्री आ' महादेवक बेटी लीली छथि।

गोसाउनिक पिता राजा मधस्थकें ई बात बुझि जे बैरसीक पहिल विवाह लीलीसँ छनि बड़ क्रोध भेलनि। ओ बैरसी आ लीलीके गूँह डाबरमे फेकवाए देलनि। गोसाउनि कोनो तरहें बैरसीकें निहोरा-मिनती कए अनलनि। ओ सौतिनक तरमे रहबाक लेल तैयार भए गेलीह। ओकर कष्टो सहबाक लेल तैयार भेलीह। किन्तु राजा मधस्थ बैरसीकें श्राप देलनि जे यदि ओ डेग पिछु पानक बिड़िया खाइत रहताह, आ' कोश पिछु कोनो तिरियासँ गप्प करैत रहताह तऽ जीताह, नहि तँ मरि जेताह। जखन गोसाउनिक मुँहबज्जी होमए लगलनि तखन लीली बैरसी लग आबि कए बैसि गेलीह। ओ गोसाउनिकें बैरसीसँ गप्प नहि करए देखिन, अपनहि गप्प कराए लागथि। गोसाउनिकें एकर बड़ तामस भेलनि। ओ लीलीकेँ कहलनि-

“लीली गे ! तोँ आढ़क झीली, तार-मसुर सन तोहर केस।

भाग-भाग गे लीली ! हट तोँ, तोरा धर्मक छो नहि लेश।”

पुनः दोसर दिन गोसाउनि बैरसीसँ गप्प कराए लगलीह। ओ भरि घर बालु ओछा देने छलीह जे लीली बालु पर ओताए नहि आबि सकैत छथि। किन्तु लीली बालु पर कंगना सब राखि ओहि घरमे पैसि गेलीह। हुनका देखि गोसाउनि माहुर भए गेलीह। ओ फेर लीली के दुत्कारल-

“कारी गे ! कचनारी, कारी भाग पसारी।

कर्म दोष की मेटतौ, जानि कियेा नहि पौतौ।।”

द्विरागमन भेलापर गोसाउनि सासुर अएलीह। एतहु स्वामी लीलीकेँ बड़ मानथिन। किन्तु गोसाउनि सासुक सोहागिनि रहथि। स्वामीक सोहागिनि नहि रहलासँ गोसाउनिकें बड़ दुख होनि। ओ सासुकेँ उलहन देखिन। सासु कहथिन की करबै।

“सासुक सोहागिनि चिनवार चढ़ि बैसथु।

साएँक सोहागिन नहरा जाए बैसथु।”

चनाइ ओ बैरसी

गोसाउनिक दाम्पत्य जीवन नीक नहि रहनि। हुनकर स्वामी बैरसी हुनकासँ भेंट नहि करथिन। एकर दुख गोसाउनिकें सहल नहि जाइन। एहि कारणे हुनका धिया-पुता नहि होइन। ओ चिन्तातुर रहथि। ओ अपन दुखनामा देओर चनाइसँ कहलनि। चनाइ सोचलनि जे घरमे लीली भाइसँ गोसाउनिकें भेंट नहि होमय देखिन, ते हेतु कोनो उपाय कएल जाय। सोचि क' ओ भाय बैरसीसँ कहलनि- सतत घरमे बैसल रहैत छी बाहरो घुमब आवश्यक। कतहु घुमय चलू। बैरसी कहलनि-हम कतहु कोना जायब? अहाँकें बुझले अछि जे हमरा ससुरक श्राप अछि डेग पाछू विरिया आ कोश पाछू तिरिया भेटत तऽ जीब नहि तऽ मरि जायब। एहन परिस्थितिमे कोना घुमब फिरब?

चनाइ उत्तर देलनि-'एकर चिन्ता अपने जुनि करू।' हम एकर सब व्यवस्था क' लेब। अपने विदा तऽ होउ। बैरसी कहल-चलु! किन्तु एहन नहि होअए जे अपटी खेतमे प्राण चल जाए।

चनाइ पुनः कहलनि-अपन सभटा भार हमरा पर रहए दिअ। हम अपनेकें कोनो प्रकारक कष्ट नहि होमए देब।

चनाइ यात्राक तैयारीमे लागि गेलाह। ओ पाँच-पाँच कोश पर खेमा खसबाओल, जतए रातिकए विश्राम कएल जा सकए। गोसाउनिकें सिखा देल गेल जे अहाँ आगू चलू। प्रत्येक रातिमे अहाँ भेष बदलि क' रहब। ओताए नीक जेकाँ भाइसँ भेंट होइत रहत। अहाँ अपना संगमे पासा लए लेब। जतए-जतए भाइसँ भेंट होएत ततए-ततए सबुतक लेल पलंग तरमे एक-एकटा पासा गाड़ैत जाएब। गोसाउनि सैह कएलनि।

बैरसी जखन घुमबाक लेल विदा भेलाह तऽ चनाइ संगमे एक मोटा पान ल' लेलनि। डेग-डेग पर चनाइ भाइकेँ एक-एक बिरिया पान देने जाथि। बैरसी कोस-कोस पर कोनो तिरिया भेटनि तकरा टोकि देखिन।

जखन ओ एक कोश गेलाह तऽ हुनका भाँग खेबाक इच्छा भेलनि। ओ चारि सखिकेँ इनार पर पानि भरैत देखलखिन तऽ टोकि देलधिन-

“बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट।

बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट।”

सखी लोकनि बैरसीक कहब नहि बुझलनि। पहिल सखी कहलनि-

“गँहीर कुआँके निर्मल पानी ओ डोलन के ठठ्ठ।

हम भरिहे तोँ पीहैं बटोहिया। तब मचिहैं गट-गट्ट।”

बैरसी कहलनि-

“नहि बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट।।”

दोसर सखी बाजल-

“तप्यत चुलहा, गरम कराही , ओ धीबन के ठठ्ठ।

हम छानब, तो खयबे बटोहिया ! तब मचिहैं गट-गट्ट।।”

पुनः बैरसी कहलनि-

“बच्ची एहि नही गट-गट्ट। बच्ची आन पिया गट-गट्ट।।”

तेसर सखी बाजल-

“लाल पलंग पर दरी बिछौना ओ तकिया के ठठ्ठ।

हम सुतब तोँ सुतिहैं बटोहिया ! तब मचिहैं गट-गट्ट।।”

पुनः बैरसी कहलनि-

“बच्ची एहि नहीं गट-गट्ट। बच्ची आन पिया गट-गट्ट। Dialog_accent>”

चारिम सखि बात बुझि गेलैक। ओ कहलक-

“लाल लच्छी केर हरियर पत्ती ओ मरिचके ठठ्ठ।

हम पीसी तोँ पीहै बटोहिया ! तब मचिहैं गट-गट्ट।।”

बैरसी प्रसन्न भए कहलनि-

“हैँ बच्ची ! एही कही गट-गट्ट।”

सब सखी मीलि भाँग-पीसि क' बैरसी के देलकनि। ओ प्रसन्न भए पीलनि। बैरसी आगू बढ़लाह तऽ देखलनि जे खड़होरिमे एक स्त्री सीकी चीरैत छथि। ओ टोकि देलनि-

“सीकी चीरै छथि, डौर लिबै छनि, डौर खसै छनि केश।

एहन धनी जँ हमरहूँ रहितथि सोने मढ़बितहूँ भेष।।”

ओ स्त्री उत्तर देलक-

“चक-चक गोर, पान मुख शोभनि, शिरमे औँठिया केश।

एहन पिया जौँ हमरहू रहितथि, सोने मढ़बितहु भेष।।”

बैरसी तेसर कोश गेलाह तऽ स्त्रीकेँ चिपड़ी पथैत देखलनि। ओकरा पूछि देलनि-

“चिपड़ी पाथय चटपटी की लट छिलकाबए केश।

कनखी भाँजए छन-छन गोरी ! तोर पिया की बेस।।”

ओ स्त्री उत्तर देल-

“पान खाय मुख फेरए डंटा, हाथि मारि बनाए बलवन्ता।

सिंह मारि करए शिकार, ताहि पुरुष के हम बहुआरि।।”

बैरसी आगू बढ़लाह। चारिम कोश पर एक दुबर पातर युवती के देखि टोकि देलनि-

“सिकिया सन धनि पातरि, फूल भरि अन्न न खाए।

जँ छुबनि एक अंग तऽ लोचन टूटि फुटि जाए।।”

युवती उत्तर देलनि-

“अमुआ फड़ए लदा-लदी, डारि लीबि-लीबि जाय।

देखू पिया ! निःशंकसँ ऊपर दैव सहाय।”

जखन बैरसी पाँचम कोश पहुँचलाह तऽ साँझ भए गेलनि। ओताए ओ खीमा खसल देखलनि। भोजनक बाद भीतर राउटीमे भेष बदलि कए गोसाउनि बैरसी कें पलंग पर गेलीह। बैरसी हुनका नहि चिन्ह सकलाह। ओ भरि राति सुखसँ बितौलनि। चनाइक सिखौलाक अनुसार गोसाउनि पलंग तरमे एक पासा गाड़ि देलनि।

दोसर दिन नित्य-क्रिया ओ भोजन-भात कए बैरसी चनाइक संग घूमए बिदा भेलाह। चनाइ पान संग लेल चललाह। किच्छु दूर गेला पर एक युवतीकेँ पोखरिमे नहाइत देखि बैरसी कहलनि-

“गोरी गे ! दह गोरी। दह पैसि कर असनान।

यौवन तोहर कादो लोटाई छौ, कर ब्राह्मणकेँ दान।।”

युवती उत्तर देलनि-

“ब्राह्मण रे तोँ छौकड़ा बढ़ि केँ भेलैँ सियान।

लाख रुपैया जकरो उठल, सेहो ने कएल लेवान।।”

बैरसी उत्तर देलनि-

“कोड़ल खेत, महुआएल बीया, पहिने खाएल सारिल सुगाब।

जनमए, फुटए, पाकए धान, तब गिरहस्त करए लेवान।।”

ई कहि ओ आगू बढ़लाह। बाटमे केरा देखलनि। ओ जलखइ लेल कीनि कए ठेढामे लटकाए लेलनि। दोसर कोस पर युवती सबकें माथमे टिकुली सटने खत्ता उपछैत आ माछ मारैत देखि ओकरासँ पुच्छि देलनि-

“खत्ता उपछल, खुत्ती उपछल, मारल रोहू बुआर।

यौवन दूनू कादो लोटाइ छौ, टिकुलीक कोन सिंगार।।”

ओहो सब तुरत उत्तर देलनि-

“पगिया तोहर लटपट भरिया, धोती तोहर छितनार।

कान्ह पर केराक भार छौ, डोपटाक कोन सिंगार।।”

बैरसी लजा कए आगू बढ़ि गेलाह। तेसर कोस पर केरा खाय पोखरिमे पानि पीबए गेलाह ओताए बानर सबकें पानि पिबैत देखि आश्चर्य भेलनि। ओहो बानर जकाँ पानिमे मुह लगाए पीबए लगलाह। ओताए पनिभरनी सब आयल रहाए। बैरसी कें बानर जकाँ पानि पीबैत देखि एक सखी दोसर सखीसैँ कहलक-

“एक देखू अलवत्त, पुरुष देखू समर्थ।

मुँह लए कए पानि पीबए, तकर की अर्थ।।”

बैरसी उत्तर देलनि-

“कानल खीजल हे सखी ! काजर लागल हत्थ।

मुँह लए पानि पीबी, तकर ठीक ई अर्थ।।”

चारिम कोश पर गेलाक बाद बैरसी सखी के अपनामे गप्प करैत देखलनि। बैरसीकेँ देखि एक सखी दोसरसँ पुछलक-

“खटिया पर सैँ पटिया देल, सोलह फाँका तरबा भेल।

हम त' पूछी हे सखी, पंथ चलय से जीबय कोना।।”

दोसर सखि बाजल-

“गुल्लरिसँ एक निकलल पाँखि, से हम देखल अपने आँखि।

ताहि बसाते खसल पचास, गुल्लरिक खाए से जीबए कोना?”

तेसर सखी पुछलक-

“अरोसीन-पड़ोसीन कुटलनि धान, ताहि घमकसैँ बहीर भेल कान।

हे स्वामी हम पुच्छै छी जे चूड़ा खाए से जीबए कोना?”

चारिम सखी बैरसी दिस देखि कहलक-

“दही काट नहु ओरे-ओरे, खैंक गड़ल तहुँ पोरे-पोरे।

पण्डित कहथुन हृदय विचारि, एहि चारूमे के सुकुमारि?”

बैरसीकेँ एकर उत्तर नहि फुरलनि ओ कहलनि जे एकर उत्तर हम घुरती काल विचारि क' देब। ताबत पाँचम सखी कहि बैसलि-

“घर जएबें घर-डिंगर होयबें बहुँ सैं एएबे सीखि।

एतबा वचन जँ पहिने कहबे, पएबे हमर पिरीति।।”

पाँचम कोश पर पहिनहि जकाँ बैरसी विश्राम कयलनि आ भेष बदलल गोसाउन संग राति बितौलनि। गोसाउनि पलंगक दोसर पौआ तरमे दोसर पासा गाड़ि देलनि।

तेसर दिन पुनः बैरसी भोजन-भात कए घूमए निकललाह। चनाइ पानक मोटा लए संग लागि गेलाह। एक कोश गेला पर बैरसी देखलनि जे एक युवती कदम्बक गाछ पर चढ़ि ओकर फूल तोड़ि रहल अछि। बैरसी ओहि युवती के टोकि देलनि-

“कदम तोड़ए कदमावती, कदमे लत्तर-फूल।

मोर वियहुआ होइते कदमा ! ऊपर उठबितहूँ छत।।”

युवती गाछि परसैँ उत्तर देल्कि-

“भल सैँ भुलले रे परदेशिया ! जँ सरदेशिया होय।

खोपामे जे फूल शोभए, फूल चुम्मा होय।।”

दोसर कोश पर एक जनीके चम्पा तोडै़त देखि बैरसी टोकि देलनि-

“कुसुम तोड़ए कुसुमावती, कुसुम लत्ते-फत्त।

मोर वियहुआ होइते कुसुमा, ऊपर उठबितहूँ छत्ता।।”

युवती गम्भीर भए उत्तर देलक-

“होय चम्पा केर तीन गुन, सुन्दर, सुभग, सुवास।

एक अबगुन मोहे लागि रही, भमरा न आबए पास।।”

तेसर कोश पर एक कवि-कांठी, बेस गोरि नारि युवतीसँ बैरसीकेँ पाला पड़लनि। ओ ओकर वर्णन करथि आ युवती आओर अधिक वर्णन करेबाक उत्साह हुनका देने जाइन।

बैरसी-“लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अढ़हुल फूल रे। तादूसँ जे लाल देखल गोरीक माथक सिन्दुर रे।।”

युवती-“लाल दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। हरियर दोहा कहितें भला, तब तऽ लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“हरियर लत्ती, हरियर फत्ती, हरियर भादव धान रे। ताहू सैं जे हरियर देखल गोरीक मूहक पान रे।।”

युवती-“हरियर दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। कारी दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“कारी आँजन, कारी भाँजन, कारी भादव मास रे। ताहू सैं जे कारी देखल, गौरी माथक केश रे।।”

युवती-“कारी दोहा कहले भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। पीयर दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“पीयर बंग पीयर ढाबुस, पीयर हरदिक रंग रे। ताहू सैं जे पीयर देखल, गोरीक नाक बेसरि रे।।”

युवती-“पीयर दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। ऊँच दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“ऊँचे आरि ऊँचे धूर, ऊँचे त खरिहान रे। ताहू सैं जे ऊँच देखल, गोरिक भथियान रे।।”

युवती-“ऊँछ दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। नीच दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“नीच आवर नीच डावर, नीच बीच पोखरि रे। ताहू सैं जे नीच देखल, गौरी आङ पोखरि रे।?”

बैरसीकें बढ़ल देखि युवती दोसर दिस टारल-

“नीच दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। तीत दोहा कहितें भला, तब त लगितौर रंग रे।।”

बैरसी-“तीत नीम, तीत करैला, तीत हरदिक पात रे। ताहू सैं जे तीत देखल, गौरी सौतिनक ठोर रे।?”

युवती-“तीत दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। गोल दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“गोल नेबो, गोल अनार, गोल पुरैनिक पात रे। ताहू सैं जे गोल देखल, गोरिक दुनू दूध रे।।”

युवती-“गोल दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। उज्जर दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“उज्जर पोठी, उज्जर मारा, उज्जर चन्ना माछ रे। ताहू सैं जे उज्जर देखल, गोरी हाथक साँख रे।।”

युवती-“उज्जर दोहा कहलें भला, से तैँ भेलहु बदरंग रे। दशम दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे।।”

बैरसी-“दश दोहा दश फूल, दश गाछक छाँह रे। ताहू सैं जे दश देखल, गौरी केर विवाह रे।।”

युवती गारि सुनि भागल। बैरसी आगू विदा भेला। बैरसी डेग-डेग पर पान आ' कोस-कोस पर तिरिया सब सैं मनोरंजन करैत जाथि, तथा प्रत्येक पाँचम कोश पर खीमामे राति कए अज्ञात रूपे गोसाउनि सैं सुख-विलास करैत जाथि। गोसाउनि सुख-विलासक साक्षी पलंगक तरमे गाड़ने जाथि। चारिम पासा पलंगक चारू पौआ तर आ एक पासा बीचमे गाड़लनि।

बैरसी पाँच दिन बाटमे बिताए छठम दिन अपन छोट भाइ चनाइक संग राजधानी वापस अएलाह। लीलीकें गोसाउनि नहि सोहाइत रहथि तैँ हेतु ओ राति कए कतए रहैत छलीह तकर खोज-पुछारी नहि करैत रहथि।

गोसाउनिक देह फाटब

थोड़े दिनक बाद गोसाुनिकें पाँचटा बेटा भेलनि जकर नाम ओधु, कछु महाभाग, श्रीनाग, ओ नागश्री राखल गेल। लीलीकें कोनो सन्तान नहि भेलनि किएक तऽ हुनका धर्मक लेस नहि छलनि। गोसाउनि धर्मात्मा छलीह तैँ हेतु ओ भरल-पूरल भेलीह। गोसाउनि चनाइकें आसीष देलनि-

“जाहि वन चन्ना चानन होएताह ताहि वन होएत पलास।

चानन सौरभ सुरभित रहब, जँ जँ बहत बसात।।”

लीलीकें ई सब सुनि बड़ डाह होइन, आ अपन सासुकेँ कहधि-गे ताँती रानी ! तोहर चनुआ कनुआ बेटा हमरा दुख दैत अछि।

लीली बैरसीक कान भरब आरम्भ कए देल। ओ कहलनि जे गोसाउनिक पाँचो बेटा चनाइक संग पाप कएलासँ भेलनि अछि। बैरसी सेहो गोसाुनिकेँ नहि मानैत छलाह आ' ने हुनका स्मरण छलनि जे हुनका संग कहियो विलास कएलनि अछि। बैरसी एहि बातक जिज्ञासा गोसाउनि सैं कयल। गोसाउनि हुनका यात्रामे पाँचो सीमाक सुख-विलासक स्मरण देखाओल आ' सबूतमे पलंगमे गाड़ल पाँचो पासा देखाओल। बैरसीकें गोसाउनिक सबूत पर विश्वास भऽ गेलनि। ओ लीलीकेँ बुझएबा लेल दूनू गोटकें धर्मक परीक्षा करबा लय तैयार भेलाह। लीलीकेँ मालभोग चाउर आ' खड़हीक दालि, ओ गोसाुनिकेँ लोहाक चाउर आ पाथरक दालि रन्हबाक लेल देलनि।

लीली गौरबाहि रहथि। बिना नियम-निष्ठासैँ भानस कएल। तेँ हेतु हुनकर चाउर आ' दालि नहि सिझलनि, किन्तु गोसाउनि धर्मात्मा छलीह। ओ नियम-निष्ठासैँ भानस कएलनि। हुनका लोहाक चाउर आओर पाथरक दालि सुसिद्ध भए गेलनि। लोक सब ई देखि गोसाउनिक धर्मक प्रशंसा कएलक। ई सुनि गोसाउनिक देह गौरबे फािट गेलनि।

तेरहम दिनक कथा

राजा श्रीकरक कथा

श्रीकर नामक राजा रहथि। हुनका एकटा बड़ सुन्दरि बेटी भेलनि। जखन हुनका टिप्पणि देखाओल गेल तऽ ज्योतिषी कहलनि जे हिनका बड़ अधलाह योग छनि। छाती लात, झोंटा हाथ, आ सौतिनक पोखरिमे अढ़ाइ झाक माटि उघथि, इयह हिनकर टिप्पणिमे छनि।

राजा ई सुनि बड़ दुखी भेलाह। अपन साध्य किच्छु नहि छनि, ओ एहिमे की कए सकितथि। बेटी जखन विवाहक योग्य भेलथिन तऽ राजा मरि गेलाह।

श्रीकर राजाक बेटाक नाम चन्द्रकर रहनि। पिताक मृत्युक बाद चन्द्रकर राजा भेलाह। माए सतत चन्द्रकरकेँ बहिनिक विवाह करएबा लय तंग करथिन मुदा चन्द्रकरकेँ बहिनिक टिप्पणिक बात मोन छलनि। ओ अपन माएसँ कहलनि- “हम बहिनिक विवाह नहि करायब। हम हुनकर अपमान नहि सहि सकैत छी। छाती लात झोंटा हाथ आ सौतिनिक पोखरि अढ़ाइ झाक माटि उघब देखि, हमरा बर्दास्त नहि होयत। हम एकर निराकरण सोचि रहल छी। जे ने कियो हुनका देखतनि आ ने ककरोसँ विवाह हेतनि, ने कियो छाती मे लात मारतनि आ ने किया झोंटामे हाथ लगौतनि, ने सौतिनक पोखरिक मािट उघय पड़तनि।”

राजा चन्द्रकर एक निर्जन वनेमे मािटमे एक बड़ पैघ सोन्हि खुनबाओल। ओहिमे रहबाक योग्य एक घर आ एक इनार सेहो बनबाओल। एक चेरियाक संग बहिनिकें ओहि सोन्हिमे बास दए देल। ऊपरसँ सोन्हिक मुँह बन्द कए देल। कनेक द्वारि ओहिमे छोड़ि देल गेल, जाहि बाटेँ बसात जा सकय। कोनो तरहँ एक आदमी बाहर-भीतर कय सकय। राजकुमारी अवला छलीह। हुनका भाइक बात मानय पड़लनि। ओ सोन्हिमे दिन काटय लगलीह। भाय मास दिन पर खयबा-पीबाक वस्तु पठबैत रहथिन।

एक दिन सुवर्ण नामक राजा शिकार खेलाइत ओहि बनमे पहुँछलाह, जतए राजकुमारी सोन्हिमे रहैत छलीह। राजाकें पियास लागि गेलनि। ओ पानि तकैत छलाह। अचानक हुनका चुट्टी सब पर नजरि गेलनि। चुट्टी सब एक धारीसँ जाइत छलाह। जखन राजा ओकरा देखलनि त देखैत छथि जे चुट्टीक मुँहमे साग आ भात छैक। राजा कें विश्वास भेलनि जे एहि लग-पासमे कियो मनुष्य रहैत अछि। ओ चुट्टी धारीक अन्त तक गेलाह। ओ देखैत छथि जे एक झाड़ीमे गिदर वा साहीक बिल सन सोन्हि छैक, ओहिसँ चुट्टीक धारी बहरेलैक अछि। राजा सोन्हिमे पैसि गेलाह। भीतर गेलाक बाद देखैत छथि एकटा बढ़ियाँ आँगन आ एक इनार। ओ हाक लगौलनि- “कियो एतए छी? हमरा बड़ जोर पियास लागल अछि ! कनेक पानि पिआउ।”

हाक सुनि राजकुमारी एक पात्रमे शीतल जल अपन चेरियाक हाथैँ पठा देलनि। राजा जल पीलनि, किन्तु पियास लगले रहलनि। ओ पुनः पानि माँगि पीलनि। ओताए हुनका चेरियासँ ज्ञात भेलनि जे एक सुन्दरि राजकुमारी एहि सोन्हिमे रहैत छथि, आ' ओ कुमारिये छथि।

ओहि राति राजा ओताए रहि गेलाह, आ राजकुमारक सुन्दरता देखि राजकुमारी मोहित भए गेलीह। ओ राजकुमारीसँ विवाह कए लेल ओ सुख-विलास करैत किच्छु दिन ओताए बितौल। राजा अपन राजधानी घुरबाक विचार करए लगलाह। राजकुमारी कहलनि- “जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई बात मोन राखब जे साओन सूदि तृतीयाकेँ मधुश्रावणी पाबनि होएतैक। ओहि दिन नवविवाहिता कनियाँ पाबनि करैत अछि। ओहि दिन कनियाँ सब सासुरक वस्त्र पहिरैत अछि आ सासुरेक अन्न खाइत अछि। तैँ मोन पारि कए ककरो द्वारा से सब पठा देब।” राजा अपन राजधानी घुरि अयलाह। कारीगरकेँ बजबाओल, आ एक खूब सुन्दर चुनरी बुनिकाए देबाए लेल आज्ञा देलनि। ई बात जेठकी रानी बूझि गेलीह। रानी सोचल जे राजा फेर कतहु दोसर विवाह कएलनि अछि तैँ ने जोलहाकेँ चुनरी बुनि देबाक लेल कहलनि अछि। एतेक दिन जे राजा निपत्ता छलाह तकर इयह कारण थीक। रानी चुपचाप जोलहाकेँ बजबाओल आ कहल-तोँ ओहि चुनरीमे छाती लात आ झोंटा हाथ” लिखि दिहैक आ ओकरा तेना कए चौपेति दिहैक जे कियो बुझौक नहि। राजाकेँ एकर खबरि नहि होइन। यदि तोँ हमर कहलानुसार कए देबैं तँ तोरा डाला भरि सोना इनाम्मे देबौक। जोलहा आमदनी देखि रानीक बात मानि गेल।

पूर्व समयमे राजा लोकनि चिड़ैँ-चुनमुनी पोसैत छलाह। ओकरा सबके प्रशिक्षित कए गुप्त काज लैत छलाह। राजा सुवर्णके सेहो एकटा कौआ छलनि। राजा चुनरी एकटा बाँसक चोंगामे दए ओकर मुह बन्द क' देलनि आ मधुश्रावणी सँ एक दिन पूर्व कौआ के देलथिन आ नव कनिआक पता बुझा दय अयबाक आदेश देलनि। कौआ चलाक रहितहूँ छल तऽ कौए। बाटमे एकटा कुम्हारक ओतय भोज रहैक, ओतय ओ चोंगा राखि ऐंठ-कूठ खाय लागल ओकरा चोंगा ओतहि बिसरि गेलैक।

मधुश्रावणी दिन राजकुमारीके सासुरसँ कोनो वस्तु नहि आयलनि ओ तमसा कए उजरा चानन सैं गौरीक पूजा कयलनि आ कर जोरि वर माँगल जे जहिया हमरा राजासँ भेंट हो तऽ हम बौक भऽ जाइ।

राजकुमारीक भाय चन्द्रकरके जखन पता लागल जे हुनकर बहिन विवाह कए लेलक त' ओ तमसा कए खर्चा पठायब बन्द कए देलनि। खर्ची बन्द भेलासँ राजकुमारीकेँ साँझक-साँझ उपास परय लगलनि। चेरियाक राजकुमारीक कष्ट नहि देखल जाइक। लग-पासमे एकटा पोखरि खुनाइत छलैंक ओहिमे मािट उघक काज करए लागल। साँझमे ब्रोनि आनि दुनू गोटे उपास तोरय। ई काज चेरिया नित दिन करए लागलि।

ओहि बोनिसँ दुनू गोटेक गुजर नहि जानि। राजकुमारी सेहो फाटल-पुरान पहिरि चेरियाक संग बोनि करय लेल गेलीह। ओतय हुनका पता लागि गेलनि जे ई पोखरि हुनकर सौतिनक खुना रहल छनि। ई बुझितहिँ हुनका टिप्पनिक बात मोन पड़लनि। ओ सोचलनि लिखलाहाके कियो नहि मेटि सकैत अछि। जखन ओ पथियामे मािट उठेलनि आ भारी लागल तऽ बाजि उठलीह-

“सिरकर सिराहि चढ़ाओल, चन्द्रकर देल बनवास।

राजा सुवर्ण वनहि बियाहल, लिखला नहि परकार।।”

जन सब ई सुनि अकचका गेल। राजकुमारी दोसर पथिया माँटि उठाओल आ ओएह फकरा बजलीह। वनमे राजा सुवर्णक विवाहक बात सुनि सबकें आश्चर्य लगलैक। संयोगसँ राजा सेहो ओहि दिन पोखरिक काज देखबाक हेतु आयल छलाह। ओहो ई फकरा सुनलनि। फकरा सुनि हुनका सब बात मोन पड़ि गेलनि-कोना ओ प्यासे व्याकुल राजकुमारीक ओतय गेलाह, केहन ओतय हुनका सत्कार भेलनि, फेर विवाह कयलनि। सब बात राजाके स्मरण होमय लगलनि। तकर बाद ओ अपन राजधानी आबि ओहि राजकुमारीकेँ विसरि गेलाह। राजाकें लाज ओ आत्मग्लानि भेलनि।

राजकुमारी तेसर पथिया माँिट फेकबाक लेल उठैलनि एहि बेर ओ आधे पथिया फेकि सकलीह ता बीचे मे राजा सुवर्ण हुनका आगाँ मे ठाढ़ भऽ गेलाह। राजकुमारीकेँ राजा चिन्हि गेलीह आ पुछलनि जे ई काज किएक कए रहल छी। राजकुमारी गौरीक वरदानक अनुसार बौकि भऽ गेलीह। ओ राजाके किच्छु उत्तर नहि दए सकलीह बौकि भेलि ठाढ़ि रहलीह।

राजा सवारी मँगाय चेरियाक संग राजकुमारीकें राजमहल लय गेलाह। ओतय स्नान कराय सुन्दर पटोर आ गहना सब पहिरा रानीके सम्मान देलथिन। तहन राजाके एहि बातक दुख होइन जे बजैत किएक नहि छथि। चेरियासँ पुछला पर ओ कहलक “मधुश्रावणी दिन अपने पाबनि हेतु किच्छू नहि पठेलिअनि ओहि तामसे राजकुमारी उजरा फूल आ उजरा चाननसँ गौड़ीक पूजा कयलनि आ गौड़ीसँ वरदान मँगलनि जे जहन हमरा राजासँ भेंट हुअय तऽ हम बौक भ' जाइ। तैं ओ नहि बजैत छथि।”

राजा जहन सब बात सुनलनि तऽ दु:खक पारावार नहि रहल। ओ कौआ के बजा चोढ़ाक खोज कयलनि। कौआके ई बात ध्यानसँ उतरि गेल रहैक। खोज करिते ओकरा कुम्हरा ओहिठामक बात मोन पड़ि गेलैक। राजा अपन दूत पठा कुम्हरा के बजबौलखिन तहन ओ कहलखिन जे हमरा एकर जानकारी नहि अछि तहन हम अपना ओहिठाम खोज करैत छियैक। कुम्हरा तहन आड़न गेल आ खोज केलक तऽ पता लगलै जे भोजाक दिन ई चार परसँ खसल आ ओकर पुतहु ओ चोढ़ा उठा कोठीमे राखि देलक से रखले रहैक। ओ आनि राजा के देलखिन आ क्षमा याचना केलक। राजकुमारीकें तहन सन्तोष भेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि। कौआक चञ्चलतासँ ई सब फसाद भेल।

चोढ़ा आनि जखन राजा देखलनि तहन सब वस्तु ओहिना अनामती छल चोढ़ामे सँ पटोर निकालि जहन देखलनि तऽ देखैत छथि जे ओहि पर लिखल अछि ‘छाती लात आ झोंटा हाथ’ राजाके ई देखिते देहमे जेना आगि लागि गेल ओ जोलहाके बजाय पुछलखिन जे ई कोना लिखल गेल ? जोलहा सब सविस्तर कहि देलक। राजा रानी के बजबाय दू खण्ड कऽ काटि गड़बा देलनि।

राजकुमारीकें आब बुझा गेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि। कौआक गलती सँ एतेक फसाद भेल। राजकुमारी अगिला साल मधुश्रावणी दिन ललका फूल आ चाननसँ गौरी पूजा कयलनि आ बोल फूटबाक वरदान मँगलनि रानीक बोल फूटलनि आ तखन ओ राजाक संग रानी बनि सुखसँ जीवन बिताबय लगलीह।

श्रीगणेशजीक सोहाग मथव आ बाँटब

मधुश्रावणी दिन गणेशजी गौड़ीसँ कहलनि- “माय आइ मधुश्रावणी थिकैक। हम सोहाग मथब आ जे माँगत तकरा देबैक।” गौड़ी कहलथिन-अवश्य मथू आ जाहि वस्तुक प्रयोजन हो से कहू। हम ओरिया देब। गणेशजी कहलनि- “हमरा धान, धनी, काठक तामा, नीम, बेल आ आमक काठी चाही।”

गौरी गणेशजीके सब वस्तुक ओरियाओन कऽ देलखिन। गणेशजी सोहाग मथलनि आ बाँटय लगलाह। सर्वप्रथम एक धोबिन आएल आ सोहाग मँगल- “गणेशजी ओकरा सोहाग देलनि आ कहलनि- “अहाँक धोबि नूआ-वस्त्र धोता, भट्ठी लगौताह, भरि दिन परिश्रम करताह आ साँझखन घर अओताह। ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त।” तकरा बाद एक कैथिन सोहाग माँगे आएल। गणेशजी हुनकहूँ सोहाग देलनि आ कहलनि- “अहाँक देवानजी भरि दिन लिखा-पढ़ी करताह आ साँझखन घर अओताह। अहाँ अपने सीकीक मौनी चड़ेरी बुनब आ खोपाक विन्यास करब। ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त।” तकरा बाद एक म लाहिन आयलि। गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ' कहल- “अहाँक म लाह माछ मारता आ बेचताह, जाल बुनताह आ टापि बनौताह। अहाँक देह मछाइन महकत। ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त।” तखन एक मालिन आयलि। गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ कहल- “अहाँक मालि भरि दिन फूल तोड़ताह आ साँझ खन माला गाँथि अपन ग्राहकक घर पहुँचौताह ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त। तकरा बाद एक गोआरि आयलि। गणेशजी ओकरो सोहाग बाँटल आ कहल- “अहाँक गोआर भरि दिन गाय-महीस चढ़ौता आ साँझ भोर दूध दुहताह अहाँ दही पौরব, घी मथब आ दूध दही बेचब। अहाँक देह फोकराइन महकत ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त।” तखन बनिआइन सेहो सोहाग माँगय अयलीह। गणेशजी हुनको सोहाग देल आ कहलनि- “अहाँक बनियाँ तराजू बटखारा धोताह आ भरि दिन सौदा बेचताह। अहाँ हुनका मदति करबनि आ अन्न सबकें फटकि बना कऽ रखबनि ताहिसँ अहाँक सुहाग बढ़त।” सबसँ पाछू ब्राह्मणी अयलीह। ओहो गणेशजीसँ सोहाग माँगला। गणेशजी हुनको सोहाग देलनि आ कहलनि- “अहाँक ब्राह्मण पूजा-पाठ करताह आ' वेद-पुराण अपनौ पढ़ताह आ विद्यार्थी लोकनिकें पढ़ाौताह। अहाँ जनौ काटब आ घर आड़न पवित्र राखब आ पवित्रसँ भानस-भात करब ताहिसँ अहाँक सोहाग बढ़त।”

एहि प्रकारक आनो-आनो जातिक सधवा सब अयलीह गणेशजी सबको सोहाग बाँटल आ अपन-अपन जातिक उपदेश देलनि। सब कियो प्रसन्न भए जाइत गेलीह।

भावार्थ

मिथिलाक नव-विवाहिता कनियाँ लोकनि द्वारा साओन मासमे मनाओल जाएबला 13 दिनक पर्व। पूजाक सामिग्री, विधि, पाँचो बीनी आ सभ 13 दिनक कथा सम्मिलित अछि।