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जितिया व्रत कथा

“मैथिली में सम्पूर्ण जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत कथा: शिव-पार्वती संवाद, पूजा विधि, चिल्होरि-गिदरनी (शीलावती-कर्पूरावती) की कथा और जीमूतवाहन का त्याग।”

जितिया व्रत कथा एवं पूजा विधि

कैलाश की रमणीक चोटी पर माता गौरी ने महादेव से पूछा— "हे प्रभु! किस व्रत, किस तपस्या अथवा किस पूजा को करने से स्त्रियाँ सौभाग्यवती बनी रहती हैं और उनकी संतानें दीर्घायु होती हैं?"

महादेव ने कहा— "आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को स्त्रियाँ अपनी संतान की लंबी आयु और मंगल कामना के लिए राजा शालिवाहन के पुत्र जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। इसमें कुश से भगवान जीमूतवाहन की आकृति बनाकर जल से भरे पात्र में स्थापित करना चाहिए। आँगन में लाल-पीले रंग की संठी से एक घर बनाएं, उसमें लाल-पीले रंग की झंडी लगाएं और चंदन, धूप आदि सुगंधित द्रव्यों से लीप दें। इसके पास एक छोटा पोखरा (तालाब) बनाएं और किनारे पर पाकड़ की डाल लगाएं। वहाँ मिट्टी और गोबर से एक चिलहोरि (चील) और एक गिदरनी (सियारिन) की आकृति बनाएं और दोनों के माथे पर सिंदूर लगाएं। बाँस के पत्तों से पूजा करने से वंश की वृद्धि होती है। पंचोपचार विधि से जीमूतवाहन की पूजा कर जो स्त्री उपवास रखती है और यह कथा सुनती है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।"

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चील (चिलहोरनि) और सियारिन (गिदरनी) की कथा

दक्षिण दिशा में समुद्र के निकट कनकावती नामक नगर में राजा मलयकेतु राज्य करते थे। उनके राज्य में बहुलूटा मरुभूमि के बीच से नर्मदा नदी बहती थी। नदी के तट पर एक विशाल पाकड़ का पेड़ था, जिसकी खोह (धोधरि) में एक सियारिन (गिदरनी) रहती थी और डाल पर एक चील (चिलहोरनि) निवास करती थी। दोनों में गहरी मित्रता थी। आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन नगर की महिलाओं को उस पेड़ के नीचे जीमूतवाहन की पूजा और कथा सुनते देख चील और सियारिन ने भी जितिया व्रत रखा।

उसी शाम नगर के एक सेठ के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई और परिजन नर्मदा तट पर दाह-संस्कार कर लौट गए। अष्टमी की रात घनघोर वर्षा और अंधकार छा गया। बिजली की चमक में अधजले शव का मांस देखकर भूख से व्याकुल सियारिन से धैर्य नहीं रखा गया। उसने पेड़ पर बैठी चील से कई बार पूछा— "हे बहना! जाग रही हो या सो गई?" चील सब समझ रही थी, इसलिए उसने कोई उत्तर नहीं दिया। चील को सोया जानकर सियारिन ने मुँह में पानी लाकर चिता की आग बुझाई, पेट भर मांस खाया और सुबह पारण के लिए भी कुछ टुकड़े अपनी खोह में छिपा लिए।

प्रातःकाल जब सियारिन ने पारण की बात छेड़ी, तो चील ने उदास मन से कहा— "सखी, तुम पारण कर लो। मैं तो ग्रामीण महिलाओं द्वारा चढ़ाए गए अक्षत और अंकुरी के नैवेद्य से पारण करूँगी।"

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पुनर्जन्म : शीलावती और कर्पूरावती

कालांतर में प्रयाग कुंभ के समय दोनों की एक साथ मृत्यु हुई। तीर्थ में मृत्यु के पुण्य से दोनों ने वेदज्ञ ब्राह्मण भास्कर के घर सगी बहनों के रूप में जन्म लिया। बड़ी बहन (चील) का नाम शीलावती और छोटी बहन (सियारिन) का नाम कर्पूरावती रखा गया। शीलावती का विवाह धनी महामत्त से हुआ और कर्पूरावती का विवाह महाराज मलयकेतु के साथ हुआ।

पूर्वजन्म में व्रत भंग करने के दोष से कर्पूरावती के सात पुत्र जन्मे, किंतु सभी की अकाल मृत्यु हो गई। वहीं निष्ठापूर्वक व्रत पूर्ण करने के पुण्य से शीलावती के सातों पुत्र जीवित और दीर्घायु रहे।

ईर्ष्या और शोक के वशीभूत होकर कर्पूरावती ने जितिया व्रत के दिन राजा मलयकेतु से तीन बार वचन लेकर शीलावती के सातों पुत्रों के सिर कटवाकर मँगवाने की हठ ठान ली। वचनबद्ध राजा ने चांडाल से सातों सिर मँगवाए। कर्पूरावती ने उन सातों सिरों को सात डालियों में पीले कपड़े से ढककर शीलावती की सातों बहुओं के पारण के लिए भिजवा दिया।

परंतु माता शीलावती के जीमूतवाहन व्रत के प्रभाव से वे सातों कटे सिर ताड़ के फल में बदल गए और सातों पुत्र जीवित होकर अपने घोड़ों पर सवार हो घर लौट आए! जब कर्पूरावती को यह समाचार मिला तो वह स्तब्ध रह गई। राजा ने उसे समझाया कि उसकी बहन के पूर्वजन्म के सत्य और व्रत के प्रभाव से ही उसके पुत्र सुरक्षित हैं।

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पूर्वजन्म का रहस्योद्घाटन

अगले वर्ष जितिया के पारण के दिन कर्पूरावती हठपूर्वक शीलावती के घर पहुँची और साथ पारण करने की जिद करने लगी। शीलावती पहले उसे नर्मदा तट पर उसी विशाल पाकड़ के वृक्ष के पास ले गईं और उसे पूर्वजन्म की सारी घटना याद दिलाई। शीलावती ने पाकड़ की खोह में छिपाए गए हड्डियों के अवशेष दिखाते हुए कहा— "पूर्वजन्म में व्रत भंग करने के दोष से तुम्हारे पुत्र नहीं बचे, और नियमपूर्वक व्रत करने के फल से मेरे सातों पुत्र जीवित हैं।" अपने कर्मों का सत्य जानकर कर्पूरावती ने पश्चाताप करते हुए वहीं देह त्याग दिया।

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जीमूतवाहन और शंखचूड़ की कथा

गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी थे। एक दिन वन में उन्होंने एक वृद्ध नाग माता को विलाप करते देखा, क्योंकि उनके इकलौते पुत्र 'शंखचूड़' की गरुड़ के भोजन के लिए बलि दी जाने वाली थी। जीमूतवाहन ने नाग माता को सांत्वना दी और स्वयं लाल वस्त्र ओढ़कर बलि-शिला पर लेट गए। जब गरुड़ ने आकर उन्हें चोंच से घायल किया, तब भी जीमूतवाहन शांत और अडिग रहे। गरुड़ ने उनके अद्भुत त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें स्वस्थ कर दिया, मृत नागों को अमृत से जीवित किया और भविष्य में कभी नागों की बलि न लेने का वचन दिया।

तभी से संतान की दीर्घायु और रक्षा के लिए आश्विन कृष्ण अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा और निर्जला जितिया व्रत करने की परंपरा चली आ रही है।

॥ इति श्री भविष्योत्तरपुराणे जीमूतवाहन व्रत कथा समाप्त ॥

🕉️ पवित्र पाठ समाप्त
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