मिथिला के मंत्र

वैदिक और पौराणिक मंत्रों का संग्रह

ॐ भूर्भुवः स्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥...
अर्थ

हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।...
अर्थ

यज्ञोपवीत अत्यंत पवित्र है, प्रजापति (ब्रह्मा) के साथ ही जिसका जन्म हुआ है, जो आयु को बढ़ाने वाला, श्रेष्ठ और शुभ्र है। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से बल और तेज की प्राप्ति हो।

एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया ।...
अर्थ

हे सूत्र! इतने दिनों तक मैंने ब्रह्म (रूप में) तुम्हें धारण किया। अब जीर्ण (पुराना) हो जाने के कारण मैं तुम्हें त्याग रहा हूँ। तुम सुखपूर्वक जाओ।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।...
अर्थ

जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।

कुशाग्रे वसते रूद्रः कुशमध्ये तु केशवः ।...
अर्थ

कुश के अग्रभाग में रुद्र (शिव), मध्य में केशव (विष्णु) और मूल में ब्रह्मा निवास करते हैं। हे पृथ्वी! मुझे कुश प्रदान करें। मैं देवताओं और पितरों के हित के लिए कुश उखाड़ रहा हूँ।

ॐ आब्रह्मन ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यौऽतिव्याधि महारथी जायताम......
अर्थ

हमारे राष्ट्र में ज्ञानी ब्राह्मण और शूरवीर क्षत्रिय उत्पन्न हों। दुधारू गायें और भारवाहक बैल हों। समय पर वर्षा हो और औषधियाँ फलवती हों। शत्रुओं की बुद्धि का नाश हो और मित्रों का उदय हो।

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।...
अर्थ

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु - ये सभी मेरे प्रभात (सुबह/दिन) को मंगलमय करें।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।...
अर्थ

हे वक्रतुंड, महाकाय, करोड़ों सूर्य के समान तेज वाले गणेश जी! मेरे सभी कार्यों को सर्वदा निर्विघ्न (बाधा रहित) करें।

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।...
अर्थ

हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा हो, हम साथ-साथ उपभोग करें, हम साथ-साथ पुरुषार्थ करें। हमारा ज्ञान तेजस्वी हो और हम आपस में द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।...
अर्थ

हम त्रिनेत्र (शिव) को पूजते हैं, जो सुगंधित हैं और हमारा पोषण करते हैं। जैसे ककड़ी (बेल) से पककर अलग हो जाती है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों, और अमरता (मोक्ष) प्राप्त करें।

ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे जगत्पते।...
अर्थ

हे सहस्त्रों किरणों वाले सूर्यदेव! आप तेज की राशि और जगत के स्वामी हैं। मुझ भक्त पर अनुकंपा करें और मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को स्वीकार करें।

ॐ सुमंगलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत।...
अर्थ

यह वधू अत्यंत मंगलमय है। आप सब आकर इसे देखें। इसे सौभाग्य का आशीर्वाद देकर अपने-अपने (गंतव्य) को प्रस्थान करें।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।...
अर्थ

जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों (सांपों) का हार धारण करते हैं। वे भगवान शिव माता पार्वती के साथ मेरे हृदय कमल में सदैव निवास करें।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।...
अर्थ

जो कुंद के फूल, चंद्रमा, और बर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ वीणा से सुशोभित हैं, और जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा सदैव पूजित, वह देवी सरस्वती मेरी जड़ता (अज्ञान) को पूरी तरह नष्ट करें।

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