अनंत चतुर्दशी व्रत कथा
“ऋषि कौंडिन्य और अनंत सूत्र की कथा, जो अनंत (भगवान विष्णु) के साथ बंधन का प्रतीक है। 14 लोकों का प्रतिनिधित्व करने वाली 14 गांठों का महत्व।”
अनंत चतुर्दशी व्रत कथा (कौंडिन्य ऋषि, सुशीला एवं १४ गांठों का अनंत सूत्र)
१. पांडवों का वनवास एवं श्रीकृष्ण का उपदेश
महाभारत काल में जुए में राज्य हारने के बाद जब पांडव वनवास में कष्ट भोग रहे थे, तब युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को भगवान अनंत (विष्णु) का व्रत करने और १४ गांठों वाला अनंत सूत्र धारण करने का उपदेश दिया।
२. सुशीला का अनंत पूजन एवं समृद्धि
प्राचीन काल में सुमंत नामक तपस्वी ब्राह्मण की पुत्री सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से हुआ। विदाई के बाद मार्ग में नदी तट पर सुशीला ने स्त्रियों को भगवान अनंत की पूजा करते देखा। उसने भी विधिपूर्वक पूजा कर १४ गांठों वाला अनंत सूत्र अपनी भुजा पर बांध लिया। इस व्रत के प्रभाव से कौंडिन्य ऋषि का आश्रम धन-धान्य व ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया।
३. अनंत सूत्र का अपमान एवं दरिद्रता
एक दिन कौंडिन्य ऋषि ने अहंकारवश सुशीला की कलाई पर बंधे अनंत सूत्र को वशीकरण का धागा समझकर तोड़ दिया और अग्नि में डाल दिया। सुशीला ने तुरंत उसे अग्नि से निकालकर दूध में डाला, किंतु भगवान अनंत के कोप से ऋषि की सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए।
४. पश्चाताप एवं भगवान अनंत का दर्शन
अपनी भूल पर पश्चाताप करते हुए कौंडिन्य ऋषि वन में 'अनंत! अनंत!' पुकारते हुए भटकने लगे। मार्ग में उन्हें बिना कीड़े का आम का वृक्ष, दो सरोवर, गाय-बछड़ा, गधा और हाथी मिले। अंत में जब वे प्राण त्यागने लगे, तब भगवान विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आकर उन्हें दर्शन दिए, उन प्रतीकों का आध्यात्मिक अर्थ समझाया और १४ वर्षों तक अनंत चतुर्दशी व्रत करने का आदेश दिया।
५. १४ गांठों का आध्यात्मिक महत्व
अनंत सूत्र की १४ गांठें भगवान विष्णु द्वारा रचित १४ लोकों (भू, भुवः, स्वः, महः, जन, तप, सत्य तथा अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल) का प्रतीक हैं।
