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सत्यनारायण व्रत कथा

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श्री सत्यनारायण व्रत कथा (पांचों अध्याय):

पहिल अध्याय (उत्पत्ति):

नैमिषारण्य तीर्थ मे शौनकादि ऋषिगण सूत जी सँ पुछलनि - 'कलियुग मे अल्प प्रयास सँ कोन व्रत द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त कएल जा सकैत अछि?' सूत जी कहलनि जे ई प्रश्न नारद जी भगवान विष्णु सँ पुछने छलाह। विष्णु भगवान कहलखिन - 'सत्यनारायण व्रतक पूजन सँ मनुष्यक सभ दुःख नाश भऽ जाइत अछि आ घर मे सुख-समृद्धि अवैत अछि।'

दोसर अध्याय (सदानंद ब्राह्मण आ लकड़हारा):

काशी मे एकटा परम निर्धन ब्राह्मण सदानंद रहैत छलाह। भगवान विष्णु बूढ़ ब्राह्मणक रूप धरि हुन्का सत्यनारायण व्रतक विधि बतेलखिन। ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक व्रत कएलनि आ धनी भऽ गेलाह। एक लकड़हारा ई देखि केँ ओहो व्रत कएलक आ ओकर लकड़ी दुगुना दाम मे बिकायल। ओहो धन-धान्य सँ संपन्न भऽ गेल।

तेसर अध्याय (साधु बनिया आ दामाद):

एकटा साधु नामक बनिया नि:संतान छले। व्रत कैला पर हुन्का 'कलावती' नामक कन्या भेलनि। बनिया संकल्प केने छलाह जे बेटीक विवाह पर व्रत करब, मुदा विवाह भेला पर ओ भूलि गेलाह। व्यापार लेल जखन ओ आ हुन्कर दामाद चंद्रकेतु 'रत्नसारपुर' गेलाह, तँ ओतय चोरीक आरोप मे राजा हुन्का दुनू केँ जेल मे डालि देलखिन।

चारिम अध्याय (लीलावती-कलावती आ प्रसाद):

बनियाक घर मे चोरी भेल आ पत्नी लीलावती आ बेटी कलावती दाने-दाने लेल मोहताज भऽ गेलीह। एक दिन कलावती विप्रक घर कथा सुनि कऽ आयलीह। तखन दुनू गोटे व्रत कएलनि। भगवान प्रसन्न भऽ राजा केँ स्वप्न देलखिन आ बनिया मुक्त भेलाह। घर एलला पर जखन कलावती प्रसाद खेने बिना पति सँ मिलऽ गेलीह, तँ पति सहित नाव डुबि गेल। आकाशवाणी भेल - 'प्रसादक अनादरक कारण एहन भेल।' कलावती दौड़ि कऽ प्रसाद खेलनि, तखन पति पुनः जीवित भेलाह।

पाँचम अध्याय (राजा तुंगध्वज):

राजा तुंगध्वज एक बार गोपालन केँ पूजा करैत देखलनि मुदा अभिमानवश प्रसाद नहि लेलनि। एहि कारण हुन्कर पूरा राज्य आ सौ पुत्र नष्ट भऽ गेल। राजा केँ अपनी गलती के अहसास भेल, ओ पुनः जा कऽ ग्वाला सभक संग प्रसाद ग्रहण कएलनि आ व्रत कएलनि। हुन्कर सब किछु वापस मिल गेलनि।

ई कथा सत्य (भगवान) क प्रति निष्ठ, प्रसादक महत्व आ अहंकार त्यागक संदेश दैत अछि।

अर्थ

भगवान सत्यनारायण (विष्णु) की कथा, जो सत्य और भक्ति पर जोर देती है। इस व्रत को करने से परिवार में सुख और समृद्धि आती है।

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