सत्यनारायण व्रत कथा
“भगवान सत्यनारायण (विष्णु) की कथा, जो सत्य और भक्ति पर जोर देती है। इस व्रत को करने से परिवार में सुख और समृद्धि आती है।”
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (संपूर्ण पाँच अध्याय)
प्रथम अध्याय: व्रत की उत्पत्ति एवं पूजन विधि
एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अठासी हजार ऋषियों ने सूतजी से पूछा— "हे मुनिवर! कलियुग में मनुष्यों को किस व्रत के करने से मनोवांछित फल और कष्टों से मुक्ति मिलती है?"
सूतजी ने बताया कि देवर्षि नारद के पूछने पर स्वयं भगवान विष्णु ने श्री सत्यनारायण व्रत का विधान बताया था। केले के खंभों से मंडप सजाकर, शालिग्राम, कलश व पंचदेवताओं की स्थापना कर सवाया प्रसाद (मोहनभोग/पंजीरी), फल, दूध और तुलसी दल अर्पित कर बंधु-बांधवों सहित कथा श्रवण करना चाहिए।
द्वितीय अध्याय: निर्धन सदानंद ब्राह्मण एवं लकड़हारे की कथा
काशी नगरी में सदानंद नामक एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहते थे। भगवान विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण का रूप धरकर उन्हें सत्यनारायण व्रत करने का उपदेश दिया। ब्राह्मण ने भिक्षा में मिले धन से श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और देखते ही देखते वे समस्त संपत्ति से युक्त हो गए।
एक दिन एक गरीब लकड़हारे ने उनके घर पूजा देखकर प्रसाद ग्रहण किया और स्वयं भी व्रत का संकल्प लिया। उस दिन उसकी लकड़ियाँ दुगुने मूल्य पर बिकीं, जिससे उसने विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत किया और सुख-समृद्धि प्राप्त की।
तृतीय अध्याय: साधु वणिक की प्रतिज्ञा एवं कारावास
राजा उल्कामुख भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण व्रत कर रहे थे। वहां साधु नामक एक धनी वणिक पहुंचा और संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी। उसके घर कलावती नामक सुंदर कन्या का जन्म हुआ, किंतु कन्या के विवाह के समय भी वणिक अपना संकल्प भूल गया।
जब वह अपने दामाद के साथ रत्नसारपुर (राजा चंद्रकेतु के राज्य) में व्यापार करने गया, तो वहां राजमहल से भागे चोर अपना चोरी का धन उनके पास छोड़ गए। सैनिकों ने दोनों को चोर समझकर कारागार में डाल दिया।
चतुर्थ अध्याय: लीलावती-कलावती का पूजन एवं प्रसाद का महत्व
इधर वणिक के घर में भी चोरी हो गई और पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती दरिद्र हो गईं। कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण कथा सुनी और घर आकर माता के साथ व्रत किया। भगवान ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न देकर वणिक को मुक्त कराया।
वापसी में दंडी संन्यासी रूपी भगवान से वणिक ने नाव में रखे रत्नों को 'लता-पत्ते' कहकर झूठ बोला, जिससे उसका धन लता-पत्तों में बदल गया। क्षमा मांगने पर पुनः धन प्राप्त हुआ। घाट पर पहुंचने का समाचार सुनकर कलावती प्रसाद खाए बिना ही पति से मिलने दौड़ पड़ी, जिससे नाव और उसके पति जल में डूब गए। आकाशवाणी सुनकर जब कलावती ने लौटकर श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया, तब नाव और पति सुरक्षित बाहर आ गए।
पंचम अध्याय: राजा तुंगध्वज एवं गोपगण की कथा
राजा तुंगध्वज ने एक बार वन में ग्वालों द्वारा की जा रही सत्यनारायण पूजा को देखकर भी अभिमानवश प्रणाम नहीं किया और उनके द्वारा दिए गए प्रसाद का त्याग कर दिया। परिणामस्वरूप राजा के सौ पुत्र और सारा राजपाट नष्ट हो गया। अपनी भूल का भान होने पर राजा ने पुनः वन में जाकर ग्वालों के साथ श्रद्धापूर्वक पूजा की और प्रसाद ग्रहण किया, जिससे उन्हें अपना खोया हुआ वैभव और संतान पुनः प्राप्त हो गए।
